अरावन और बर्बरीक की कहानी भाग – 2

राजस्थान में बोलते हुए सिर को खाटू श्यामजी के रूप में पूजा जाता है, जो कृष्ण का रूप है। शैववाद की कथाओं में उसे ‘कीर्ति-मुख’ कहते हैं।

व्यास के अनुसार धृतराष्ट्र के सारथी संजय ने अपनी दिव्य दृष्टि से सभी को युद्ध में हो रहीं घटनाओं के बारे में अवगत कराया था। लेकिन संजय कौरवों के पक्ष में थे। इसलिए, संभवतः उन्होंने जो बताया वह भी पक्षपातपूर्ण रहा होगा। दूसरी ओर बर्बरीक किसी के पक्ष में नहीं थे और इसलिए उनका वर्णन भी पक्षपातपूर्ण नहीं था। अपने प्रेक्षण स्थल से उन्होंने देखा कैसे युद्ध में नैतिकता दरकिनार हो गई और एक भाई ने दूसरे भाई का अपने सिद्धांतों और तुच्छ झगड़ों के कारण उसकी संपत्ति प्राप्त करने के लिए वध किया। लेकिन बर्बरीक का शरीर नहीं था और इसलिए वे कुछ करने में असहाय थे।

उन्होंने देखा कि गांधारी अपने मृत पुत्रों का शोक मना रहीं थी। हालाँकि पांडवों की जीत हुई थी, उनके संतानों का वध हुआ था और द्रौपदी शोक मना रहीं थी। बर्बरीक ने कृष्ण से पूछा कि क्या ऐसी स्थिति में हम किसी को विजेता कह सकते थे। कृष्ण चुप रहकर केवल हंसें।

केरल की एक लोककथा के अनुसार भीम और अर्जुन ने बोलते हुए सिर से पूछा कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में सबसे वीर योद्धा कौन था। उनका मानना था कि चूँकि उस सिर ने युद्ध को ऊंचाई से देखा था, इसलिए उसका परिप्रेक्ष्य रणभूमि में लड़ रहें योद्धाओं के परिप्रेक्ष्य से अलग होगा।

साधारण मान्यता यह है कि युद्ध में योद्धा ने योद्धा का वध किया। लेकिन उस सिर के अनुसार कृष्ण रुपी विष्णु के सुदर्शन चक्र ने दोनों पक्षों के अधर्मी राजाओं का वध किया था और द्रौपदी रुपी काली ने अपनी जीभ फैलाकर उनका रक्त पीया था। इस प्रकार, बोलते हुए सिर के दृष्टिकोण से कुरुक्षेत्र का युद्ध पांडवों और कौरवों के बीच लड़ा युद्ध नहीं था। कृष्ण अर्थात विष्णु उन राजाओं को नष्ट करके धर्म स्थापित कर रहें थे जिन्होंने द्रौपदी अर्थात काली या पृथ्वी का शोषण किया था।

इस प्रकार, शिरश्छेदित बोलता हुआ सिर कम सीमित और अधिक वैश्विक परिप्रेक्ष्य का प्रतीक है। हमारा व्यक्तिगत दृष्टिकोण हमारे पूर्वाग्रहों, अनुभवों और अपेक्षाओं से सीमित होता है। हम विश्व को इसी सीमित दृष्टिकोण से देखते हैं। बोलते हुए सिर के माध्यम से हम विश्व को अलग दृष्टिकोण से देखने लगते हैं। पांडव और कौरव परमात्मा की बृहत्तर लीला के छोटे अंश थे। महाभारत में एक राज्य की राजनीति के माध्यम से ब्रह्मांड में धर्म स्थापित करने का महत्त्व समझाया गया है।

बोलते हुए सिर की तिरस्कारपूर्ण हंसी अधिक रोचक है। यह सिर सभी योद्धाओं से शक्तिशाली था। उसके प्रेक्षण स्थल से वह सभी योद्धाओं की छिपी, दमित और गोपनीय इच्छाएं देख सकता था, जो दूसरे देख नहीं सकते थे। इसलिए, वह उनकी धार्मिकता के दिखावे पर हंसा। उसके सामने दिखावा करना असंभव था।

इसी कारण बोलते हुए सिर को भारतभर में पूजा जाता है। कद्दू से बनें घर के द्वार पर लटकें ऐसे सिरों की बड़ी आंखें होती हैं और उनकी जीभ बाहर लटकी होती है। ऐसे सिर मंदिर में, देवता के चारों ओर डाट पर या मंदिर के द्वार पर भी देखें जाते हैं।

राजस्थान में बोलते हुए सिर को खाटू श्यामजी के रूप में पूजा जाता है, जो कृष्ण का रूप है। शैववाद की कथाओं में उसे ‘कीर्ति-मुख’ कहते हैं। यह मान्यता है कि कीर्ति-मुख ने शिव के आदेशानुसार अपनी भूख मिटाने के लिए अपने आप को ही खा लिया था। चूँकि उसने किसी और को ना खाते हुए स्वयं को जीवित रखा था, इसलिए उसे देवताओं की प्रतिमाओं के ऊपर रखकर सभी श्रद्धालुओं की ठठ्ठा करने का अधिकार प्राप्त हुआ। इस स्थान से वह सभी कुछ देख तो सकता है लेकिन उपहासपूर्ण स्वर में कटु शब्दों से अपने विचार साझा करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता है। उसकी बड़ी आंखें, शरीर का ना होना, नुकीलें दांत और बाहर लटकी जीभ इसका प्रतीक हैं।

बोलता हुआ सिर हमें याद दिलाता है कि महाकाव्यों के नायकों से शक्तिशाली भी एक शक्ति है। हमारी तुलना में यह शक्ति हमें और अच्छे से समझती है। यह सिर सच कहकर अंतःकरण को व्यक्त करता है। वह निर्भयता से उस भ्रष्ट सच्चाई को सामने लाता है जिसे महाभारत के नायकों और खलनायकों ने दमित किया या नकारा। हम भले ही अपनी क्रियाओं के लिए क्षमा मांगें और अपनी मूर्खताओं तथा दुष्कर्मों की सफ़ाई दें, लेकिन इस सिर के कान नहीं हैं और इसलिए वह हमारी एक नहीं सुनता।