प्रेम और सद्भावना

मानव, मानव से प्रेम करना सीखे

कर्म एक बीज है जिसके उगने पर हमें दुख या सुख की प्राप्ति होती है। सुख पाने के लिए अच्छे कर्म रूपी बीज बोयें।

जब किसी मनुष्य पर कोई समस्या आती है तो वह भगवान से गुहार करने लगता है कि मेरी रक्षा करो, मेरी रक्षा करो। लेकिन, भगवान की संतान होकर हम यदि भगवान की अन्य संतानों को पीड़ा पहुँचाते हैं, तो क्या भगवान हमारी पुकार सुनेंगे? कदापि नहीं। उनकी सन्तान को संकल्प, वाणी, कर्म से हम दुख देते हैं तो भगवान हमसे कभी खुश नहीं हो सकते। दुख देने की भावना के बोझ से हमारे अन्दर प्रेम के बजाय नफरत की चिनगारी उड़ती रहेगी। नफरत हमारे विकास की राह पर बहुत बड़ा रोड़ा है। अतः भगवान को खुश करने के लिए जाति-भेद, धर्म भेद, रंग-भेद, ऊँच-नीच का भेद, धनी-गरीब का भेद भूल जायें क्योंकि ये भेद भगवान की देन नहीं हैं। हम सभी आत्माएँ भाई-भाई एक-दूसरे से प्रेम करना सीखें, तब भगवान हमसे खुश होगे और हम पर रहम करेंगे।

हमारे किसी बच्चे को कोई यदि किसी प्रकार की चोट पहुँचा रहा हो तो क्या हमें उस व्यक्ति पर रहम आयेगा? किसी भी प्रकार से उसको मदद हम करेंगे? नहीं कर सकते हैं। इसी प्रकार, मानव को आहत कर हम भगवान से मदद नहीं ले सकते हैं। चाहे लाख चिल्लायें, पूजा-पाठ करें, तीर्थ भ्रमण करें लेकिन मानव को सता कर हम कभी भी सुखी और खुश नहीं रह सकते। अतः दुनिया में सबसे प्रेम से चलना सीखें। प्रेम से ही आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक और मानसिक विकास होगा। हमारा भारत स्वर्णिम बनेगा।

जब हम निःस्वार्थ स्नेह का दान करते है तो लोगों की दुआ और सहयोग पाते हैं। हमारे अंग-अंग प्रफुल्लित हो उठते हैं। इसकी भेंट में नफरत को अपनाने से हमारे रोम-रोम में विष भर जाता है और चेहरे से खुशी गायब हो जाती है। अतः हम सभी मानव अपने अंदर प्रेम रूपी सुगन्ध भरकर जहाँ-तहाँ फैलायें, सदा खुश रहें और खुशी बाँटें।

प्रेम को कायम रखने के लिए इसके सबसे बड़े लुटेरे अहंकार को त्यागना होगा। यही सभी बुराइयों की जड़ है जबकि नम्रता सभी अच्छाइयों का भंडार है। संसार में प्रेम सर्वोत्तम है, इससे असंभव काम भी संभव हो जाते हैं। यह वह साधन है जिससे बिगड़ा हुआ काम भी बन जाता है। कर्म एक बीज है जिसके उगने पर हमें दुख या सुख की प्राप्ति होती है। सुख पाने के लिए अच्छे कर्म रूपी बीज बोयें। अच्छे या बुरे कर्म कोई देखे या न देखे लेकिन उनका फल तो निकलता ही है।

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