कर्म छिपाया ना छिपे

कर्म छिपाया ना छिपे

चाहे सात समुद्र भी कर्म के फल को रोकने की कोशिश करें तो भी वह आगे आकर खड़ा हो जाता है।

एक बार दो मित्र कमाई करने के लिए गांव से शहर जा रहे थे। एक दोस्त बहुत गरीब था, दूसरे के पास धन था। जंगल का रास्ता था, बरसात हो रही थी इसलिए रात के समय एक जगह रुक गए। गरीब दोस्त के मन में विचार आया कि क्यों ना मैं इसे मार करके सारा धन ले लूं फिर कमाई के लिए शहर जाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। उसने ऐसा ही किया।

मरते समय अमीर दोस्त ने कहा, तुम्हारा कर्म छिपेगा नहीं। गरीब दोस्त ने कहा, कोई देख तो रहा नहीं, कौन गवाही देगा कि मैंने ही तुम को मारा है। तब मरते हुए अमीर दोस्त ने कहा, ये बरसात की बूंदें मेरी गवाही देंगी और ऐसा ही हुआ। इस अपराधी की पत्नी एक रात अपनी बहुत ही करीबी सहेली के पास रुक गई। बरसात की बूंदों को देख करके उसे अपने पति की बताई हुई बात याद आ गई। उसने वह बात अपनी सहेली को बता दी क्योंकि उसे उस पर पूरा विश्वास था। सहेली ने यह बात अपने पति को बता दी। पति, सीआईडी कार्यालय में अधिकारी था और उसी केस की तलाश में था। यह बात पत्नी को पता नहीं थी। इस प्रकार सत्य सामने आ गया, बूंद ने सबूत दे दिया और अपराधी पकड़ा गया। किसी ने सच ही कहा है कि अपराध हो या गलती, कभी छुपती नहीं है। इस बात को जानते हुए भी मनुष्य पाप करके उसे छिपाने के लिए क्या कुछ नहीं करता लेकिन वह कुछ भी कर ले, किया हुआ कर्म सामने आ ही जाता है। कबीर जी ने सच ही कहा है,

कबीर करनी अपनी कबहु न निष्फल जाए।

सात समुद्र आड़ा पड़े, मिले अगाऊ आए।।

भावार्थ है कि चाहे सात समुद्र भी कर्म के फल को रोकने की कोशिश करें तो भी वह आगे आकर खड़ा हो जाता है।

मनुष्य अपने सुख या दुख के लिए खुद ही जिम्मेदार है। प्रकृति का नियम है, हम जो बोते हैं वही पाते हैं, किसी को खुशी देंगे तो वह दुगुनी हो कर हमारे पास आएगी। फिर हमें खुशी को ढूंढना नहीं पड़ेगा। मानव का सबसे बड़ा साथी उसका कर्म है। वह वस्तु, व्यक्ति से पीछा छुड़ा सकता है पर कर्म से नहीं इसलिए अपने कर्मों पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है।

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