मैं अमृतपुत्र हूँ

मन अगर सदा आनंदित रहना सीख लेगा तो फिर हमारी उन्नति को भी पंख लग जाएंगे।

एक युवक को मुसीबतों ने कुछ ऐसा घेरा कि उनसे बाहर निकलने का‌ हर प्रयास असंभव हो गया। उसे लगने लगा कि सिवाय मृत्यु के अब इनसे कोई मुक्ति नहीं दिला सकता है। वह पढ़ा-लिखा था। एक छोटी सी नौकरी भी करता था, पर दुर्भाग्य से वह नौकरी भी छूट गई थी। परिवार का भार ढोना उसे असह्य लग ही रहा था कि वह बीमार हो गया।

डॉक्टर ने उसकी जाँच की और कहा– “तुम एक असाध्य रोग के शिकार हो चुके हो।” उसकी आँखों के आगे अंधेरा सा छा गया। उस ने सोचा, “अब जीने का क्या फायदा? अच्छा है, जल्दी ही मृत्यु मुझे इन सब परेशानियों से मुक्त कर देगी।”

एक दिन वह जीवन से निराश एक सुनसान सड़क से, एक सूखे पत्ते की तरह यहां से वहां चक्कर काट रहा था। चलते-चलते उसे कहीं दूर किसी मंदिर से यह प्रार्थना सुनाई दी–

हे अमर पुत्र परमात्मा के, तुम जागो।
ना बनो तुम गुलाम हालात के, जागो।
तुम तो हो स्वयं अपने भाग्य विधाता।
उठो, जागो! भाग्य का सितारा तुम्हें पुकार रहा है।

इस गीत के महान संदेश ने उसके थके कदमों को रोक दिया। उसे लगा इस गीत के शब्द शायद उसे ही सम्बोधित कर रहे हैं। गीत के एक-एक शब्द ने उसे अंतर तक हिला दिया। उसके कदम मंदिर की ओर उठ गए। वह वहाँ जाकर एक शांत कोने में बैठ गया। कुछ ही देर में वहाँ बैठे सभी भक्त कीर्तन करने लगे

ओ बेसहारों के सहारे,ओ निराधारों के आधार,
तुम्हारे चरणों में आया हूं, मैं बेकरार,
अब बन जाओ तुम ही मेरे जीवन के आधार!

इस कीर्तन को बार-बार भावपूर्ण होकर सभी भक्त दोहरा रहे थे। उस युवक के मुख से भी ये पंक्तियाँ अपने आप ही निकलने लगीं। कुछ समय बाद वह इस कीर्तन में ऐसा खोया कि अपनी सारी चिंताओं को भूल कर, अपने अंदर एक अनोखे आनंद की अनुभूति करने लगा।

अब वह उस मंदिर में हर शाम जाकर कीर्तन करने लगा। उसकी जिंदगी में अब एक नया मोड़ आ चुका था। अब जिंदगी के प्रति उसका दृष्टिकोण बदल चुका था। वह सोचने लगा- मैं अमृतपुत्र हूँ। मैं अब हार नहीं मानूंगा। ईश्वर सदा मेरे सहायक हैं।

उसने स्वयं में एक नया आत्मविश्वास पाया। उसका मानस बदला तो शरीर भी स्वस्थ होने लगा। उसने अपने अंदर फिर से जोश महसूस किया और एक नई जिंदगी की शुरुआत की। आज उसकी उम्र 50 वर्ष है, परन्तु उसके अंदर वही तरुणाई का जोश है। वह एक बड़ी कंपनी में उच्चपदाधिकारी है। वह ईश्वर को अपना सहयोगी मानता है, अतः अपने लाभ का आधा हिस्सा, जो एक लाख रुपए से ज्यादा होता है, गरीबों की सेवा पर खर्च करता है।

हम भी हमेशा कई चिंतित और निराशा  से भरे लोगों को देखते हैं, और स्वयं भी कई बार इसके शिकार हो जाते हैं। हमारे मन की दुर्बलता हम पर शासन करने लगती है। हमें इस गुलामी को त्याग कर, ईश्वर की शरण में जाकर एक नए आनंद के साथ, नई दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। मन अगर सदा आनंदित रहना सीख लेगा तो फिर हमारी उन्नति को भी पंख लग जाएंगे।

जीवन में अपना दृष्टिकोण और विचारधारा बदलने से हम स्वस्थ तन-मन पाते हैं। यह विचार प्रक्रिया ही हमें जागरूक बना कर हमें सही राह पर ले जाती है।

हमारा स्वर्ग-नर्क हमारे द्वारा ही निर्मित होता है। दिव्य विचारों से, दिव्य शक्तियां प्राप्त होती हैं। एक ऐसा अनंत आनंद का सागर अंतर में छलछलाने लगता है कि हम जहां भी जाते हैं, वहां आनंद व उल्लास फैल जाता है।

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