ज़िंदगी का नाम है हमेशा चलते जाना

ज़िंदगी का नाम है, हमेशा चलते जाना

उसके पति के निधन के बाद उसे गहरा धक्का लगा, ज़िंदगी में एकाकीपन भर दिया था। वियोग के उस पल में उसने निर्णय लिया, उसने कहा... बहुत हुआ अब मैं ये बर्दाश्त नहीं कर सकती।

एक दिन वो अपने महल जैसे घर की बालकनी में वो अकेले बैठी थी। उस दौरान पास के नए अपार्टमेंट में वन बीएचके के फ्लैट में रहने आए नवविवाहित जोड़ों को आपस में बात करते हुए देख रही थी। यह फ्लैट उसके घर के करीब था।

एकाएक उसके मन में अपने पति का ख्याल आ गया, देखते ही देखते वो उसके बारे में सोचने लगी। जो अब केवल एक याद बनकर रह गया था।

वहां से नज़रें हटाकर उसने पार्क की ओर देखा, वहां एक जोड़ा एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर चल रहा था। मन ही मन वो फिर सोच में पड़ गई, इन कपल्स की तरह वो भी अनुभव करना चाहती थी, वो इसके लिए मानो तरस गई थी। कुछ क्षणों के बाद घर में खालीपन की गूंज व अपनी ही सिसकियों से उसका ध्यान टूट गया और वो हकीकत में लौट आई। 

दो साल पहले उसके पति की मौत होने के बाद वो अकेली पड़ गई थी, जीवन में एकाकीपन सा आ गया था। उस क्षण के बारे में सोचा, तो उसे याद आया कि पति की मौत के बाद किसी प्रकार उसने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया था। वहीं हर किसी से मिलने के लिए इनकार कर दिया था। वियोग के उस पल में उसने निर्णय लिया, उसने कहा… बहुत हुआ अब मैं ये बर्दाश्त नहीं कर सकती। उसके पति की जगह कोई और नहीं ले सकता।

इस वाक्ये को गुज़रे अब दो साल हो चुके थे। लेकिन जब भी उसे उस बेबस दिन की याद आती उसकी आंखों से आंसू आ जाते थे। बीते दिन को याद कर वो एक बार फिर यादों के झरोखों में खो गई। वो दिन सामान्य दिनों की तरह ही था। दोनों उठे और घर के काम काज को पूरा करने में जुट गए। दोनों एक दूसरे को इतना प्यार करते थे कि कई बार बातों को बोलने की बजाय सिर्फ नज़रों से ही काफी कुछ बयां कर देते थे। लेकिन इनकी खुशियां उस वक्त खत्म हो गई जब उसे ऑफिस से एक फोन आया। इस कॉल ने उसे अकेला छोड़ दिया, वो ज़िंदगी (Zindgi) भर खुद को अकेला महसूस करती रही। वो जीना भी नहीं चाहती थी, लेकिन अपने नन्हे बच्चे की खातिर उसने खुद को रोक लिया।   

वह सीढ़ियों से जल्दबाजी में दौड़ते हुए नीचे की ओर भागी, वो देखना चाहती थी कि वहां क्या हो रहा है। वहां उसने देखा कि उसकी बेटी गायब थी। वो खुद को कोसने लगी… कि आखिरकार क्यों मैं अपने अतीत की यादों में खो गई। वो जल्दी-जल्दी घर के सभी कमरे, किचन, गलियारे, छत पर गई। लेकिन उसकी बेटी कहीं नहीं मिली। एक पल के लिए उसे लगा कि कहीं उसने अपनी बेटी को भी तो नहीं खो दिया। 

कुछ पल के बाद पीछे से बच्ची की हंसी की आवाज़ सुन पीछे पलटी। देखा उसकी बेटी ठहाके लगाकर हंस रही है। देखा कि उसका बचपन का दोस्त उसकी बेटी को गोद में उठाकर उसकी ओर बढ़ा चला आ रहा है। आज की धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी लग रही थी। 

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