एलिजाबेथ फ्रीमैन, गुलामी से आजादी तक

एलिजाबेथ फ्रीमैन: गुलामी से आज़ादी तक की दास्तां

एलिजाबेथ फ्रीमैन वह चिंगारी थीं, जिन्होंने दास प्रथा उन्मूलन के लिए समाज का डटकर सामना किया और मिसाल बनीं।

“एक वक्त ऐसा था, जब मैं गुलाम थी, जिसने गुलामी को झेला है, उसे आज़ादी की अहमियत पता है। अगर उस समय कहा जाता कि आज़ादी का एक मिनट मुझे मिलेगा और उस एक मिनट में मेरी मौत है, तो मैं मरना पसंद करती। मैं उस समय एक मिनट के लिए भगवान को शुक्रिया अदा करती कि मैं एक स्वतंत्र महिला के रूप में मरी हूं।” – एलिजाबेथ फ्रीमैन उर्फ मम बेट।

एलिजाबेथ फ्रीमैन (Elizabeth Freeman) इतिहास की क्रांतिकारी महिला के रूप में जानी जाती हैं। इनका जन्म 1740 के आसपास हुआ था। नस्लवाद आज कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह 17वीं शताब्दी में अपने चरम पर थी। जब अश्वेतों को श्वेतों के द्वारा दास बनाया जाता है। इस दासिता को श्वेतों द्वारा भेदभाव के तौर पर समझा जा सकता है। इस समय ट्रांसाटलांटिक दास व्यापार चरम पर था, दासों को अफ्रीका से संयुक्त राज्य अमेरिका लाया जाता था। किसी को भी इस बात में कोई रुचि नहीं थी कि वे दास कहां से आ रहे हैं या उनका नाम क्या है या उनका जन्म कब हुआ था? दासों की एकमात्र पहचान उनकी त्वचा का रंग था। एलिजाबेथ फ्रीमैन का जन्म भी इन्हीं काले दिनों में न्यूयॉर्क के क्लेवरैक के एक फार्म में हुआ था। पीटर हॉगबूम एलिजाबेथ का मालिक था, जिसने कुछ महीने की नन्हीं एलिजाबेथ को अपना गुलाम बना लिया था। जिसके बाद इनका नाम उसने बेट रखा था।

उस समय में गोरों के लिए सांवले लोग उनकी जागीर हुआ करते थे। उनका मानना था कि यह आदेश स्वयं ईश्वर का है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए हॉगबूम ने भी अपनी बेटी हना की शादी में 7 साल की एलिजाबेथ फ्रीमैन को गुलाम के रूप में दान कर दिया। उस समय ऐसी परंपरा चल रही थी कि जब कोई भी व्यक्ति अपने पुत्र या पुत्री की शादी करता था तो दहेज के रूप में गुलाम (Dahej ke roop me gulam) भेंट करता था। ज्यादातर अश्वेतों की ज़िंदगी इसी तरह से गुजर रही थी।

एलिजाबेथ फ्रीमैन, गुलामी से आजादी तक

ट्रांसाटलांटिक दास व्यापार के दौरान गुलामों की स्थिति

उस वक्त अश्वेत बच्चों का जीवन आसान नहीं था, बच्चों को बहुत कम उम्र में ही उनके माता-पिता से दूर कर दिया जाता था। एलिजाबेथ के साथ भी यही हुआ था। इसके अलावा उनसे पूरे दिन में लगभग 15 से 20 घंटे तक काम करवाया जाता था। लेकिन इसे किस्मत ही कह लीजिए कि एलिजाबेथ फ्रीमैन का जीवन कपास के खेतों में काम करने वाले दासों की तुलना में बेहतर था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनका जीवन सरल था। उनके सामने भी कई समस्याएं थीं।

उनकी मालकिन हना डच परिवार से संबंध रखती थी। उसका रवैया ही उसके परिवार और परवरिश के बारे में बताता था, क्योंकि वह नौकरों के साथ बुरा व्यवहार करती थी। हना मैसाचुसेट्स के शेफ़ील्ड में रहती थी, जिसके घर के छोटे-बड़े काम जैसे साफ-सफाई, खाना बनाने से लेकर बच्चे संभालने तक सब एलिजाबेथ करती थी। हमा के घर में गलती, आराम या छुट्टी के लिए कोई जगह नहीं थी, जो शारीरिक रूप से एलिजाबेथ के लिए कष्टदायी था। उन्हें रोजाना एक नई मुश्किल झेलनी पड़ती थी। इन्हीं कठिन परिस्थितयों ने एलिजाबेथ फ्रीमैन को एक हिम्मती और निडर महिला बना दिया।

जब एलिजाबेथ की उम्र 36 साल हुई, तो उन्होंने इस अत्याचार के खिलाफ पहली बार आवाज़ उठाई। ऐसा तब हुआ जब हना ने एक छोटी बच्ची लिजी पर अत्याचार किया। जिसे देखकर एलिजाबेथ खुद को रोक नहीं पाईं और वर्षों से चली आ रही कुप्रथा के खिलाफ चिंगारी बन कर सामने आईं। कुछ लोगों का मानना था कि रिश्ते में लिजी उनकी बेटी या बहन थी। लिजी, एलिजाबेथ की कुछ भी हो, लेकिन इस चिंगारी ने अश्वेत समुदाय को अत्याचार के खिलाफ लड़ने के लिए हिम्मत दी।

एक बड़े बदलाव के पीछे की घटना थी कि एक दिन लिजी ने घर में बचे हुए सामानों से उस बर्तन में केक पकाया था, जिसमें हना का परिवार खाना बनाता था। यह बात हना को रास नहीं आई और वह गुस्से में आगबबूला हो कर गर्म चम्मच से मारने जा रही थी। यही बात एलिजाबेथ को बर्दाश्त नहीं हुई और उन्होंने लिजी को बचा लिया।

गुलामों पर होने वाला असहनीय अत्याचार

इस घटना के बाद एलिजाबेथ फ्रीमैन ने हना का घर छोड़ दिया और कभी भी वापस ना लौटने का फैसला किया। शायद से पूरे मैसाचुसेट्स में ऐसा करने वाली पहली अश्वेत व्यक्ति एलिजाबेथ थीं। ऐसा कहना इसलिए भी सही है, क्योंकि अश्वेतों में कानून तोड़ने का डर काफी हद तक विद्यमान था। लेकिन उस वक्त एलिजाबेथ को कहीं से भनक लग गई थी कि कानून में अहम बदलाव किए जा चुके हैं। उन्होंने एक दिन कुछ लोगों को आपस में बात करते हुए सुना था कि ‘अब स्वतंत्रता सबका अधिकार, हर व्यक्ति अपने हिसाब से जीवन जी सकता है और कानून व्यवस्था सबके लिए बराबर है।’ लेकिन यह बात अन्य दास लोगों को नहीं पता थी।

कानून में हुए बदलावों ने एलिजाबेथ फ्रीमैन के मन में उम्मीद एक किरण जगा दी। अब उन्हें अपने स्वतंत्र होने का रास्ता साफ दिखाई दे रहा था। इसके लिए एलिजाबेथ ने येल विश्वविद्यालय के कानून स्नातक थियोडोर सेडग्विक से बात की, जो अपने समय के इज्जतदार वकील और अत्याचार उन्मूलन के समर्थक थे। उन्हें पता था कि एलिजाबेथ कानून की जागरूक थीं, इसलिए वह उनका मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद सेडग्विक ने एलिजाबेथ का केस अपने दोस्त एशलेज़ के खिलाफ लड़ा।

सेडग्विक कोर्ट में रिट फाइल कर के एशलेज़ को एलिजाबेथ और अन्य दासों को स्वतंत्र करने की बात कही। लेकिन एशलेज़ ने साफ मना कर दिया, जिसके बाद सेडग्विक ने ग्रेट बैरिंगटन में कंट्री कोर्ट ऑफ कॉमन प्लीज़ में एशलेज़ के खिलाफ केस दाखिल कर दिया। न्यायाधीश ने केस की सुनवाई के दौरान एलिजाबेथ फ्रीमैन के पक्ष में स्वतंत्रता का निर्णय सुनाया। एलिजाबेथ एक गुलाम से स्वतंत्र महिला बन गईं। उनका केस उन लोगों के लिए मिसाल बना, जिन्होंने अब तक जंजीरों को तोड़ कर बाहर निकलने की कोशिश नहीं की थी। बाकी लोगों ने भी आगे चल कर कोर्ट में याचिकाएं दायर की और आज़ादी को गले लगाया। मैसाचुसेट्स में इस तरह की क्रांति पहली बार देखने को मिली थी। याचिकाओं को देखकर मैसाचुसेट्स की अदालत ने पूरे राज्य से ही दासिता को समाप्त करने का फरमान जारी किया। लोगों की आज़ादी का सपना सच हुआ, लोगों ने आज़ादी से अपना जीवन जीना शुरू किया।

आजादी मिलने के बाद सेडग्विक ने एलिजाबेथ फ्रीमैन को नौकरी पर रख लिया। एलिजाबेथ उनके बच्चों की देखभाल करती थी, साथ ही हाउसकीपिंग और गवर्नेस के रूप में नियुक्त थीं। उन बच्चों में से कैथरीन सेडग्विक ने एलिजाबेथ को काफी करीब से समझने की कोशिश की और उनके जीवन पर एक किताब में भी लिखा। एलिजाबेथ की लड़ाई और आज़ाद होने के जुनून से कैथरीन प्रभावित थी। एलिजाबेथ की कहानियां सुन कर वह बड़ी हुई थी। उन्होंने अपनी किताब के जरिए एलिजाबेथ के साहस, संघर्ष, मानवता और समानता के प्रति उत्तेजना के बारे में बताया।

दासिता के जीवन से मुक्त होकर एलिजाबेथ फ्रीमैन का 1829 में देहांत हो गया। उन्हें सेडग्विक परिवार ने अपने कब्रिस्तान “सेडग्विक पाई” में दफना दिया। आज भी उनकी क्रब पर एक शिलापट पर लिखा है कि “उनका जन्म एक दासी के रूप हुआ, 30 साल तक वह दासी ही रहीं। वह पढ़-लिख भी नहीं सकती थी, लेकिन फिर भी उन्होंने जो हिम्मत दिखाई उससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है।“

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