योग, योग का महत्व

भारत से निकल दुनियाभर में कैसे पहुंचा योग?

भारत की पहचान रहा योग आज ग्लोबल हो गया है। दुनिया का शायद ही कोई कोना हो जहां लोग योगा न करते हों, भले ही इसका रूप थोड़ा अलग हो। वैसे इसमें समय के साथ कई बदलाव भी आए हैं।

योगा यानी भारत की ‘स्वस्थ रहने की संस्कृति’। यह आज हर जगह पहुंच चुका है। दुनिया में कम ही ऐसे लोग होंगे जिन्होंने इसके बारे में नहीं सुना हो। अब बड़ी संख्या में लोग इसे समझ चुके हैं और इसके फायदे जान चुके हैं। इसी के चलते योगा करने वालों की संख्या भी पूरी दुनिया में तेज़ी से बढ़ी है। चाहे वो हॉलीवुड हो या यूरोप के अलग-अलग शहर। अलग-अलग आस्था के लोग अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर योगाभ्यास (Yoga practice) करते हैं। कुछ इसे फिटनेस के लिए करते हैं, जबकि कुछ इसके ज़रिए अध्यात्म की तरफ बढ़ना चाहते हैं। अब हज़ारों लोग इसके बारे में ज़्यादा जानना और सीखना चाहते हैं। ऐसे लोग दुनियाभर के कई फिटनेस सेंटर्स, संस्थानों और आश्रमों का रुख करते हैं। जहां इसके लिए कोर्स, प्रोग्राम और रिट्रीट होते रहते हैं। जाहिर है अब लोग सिर्फ योग करना ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ना भी चाहते हैं।

आज यह दुनिया के कोने-कोने में पहुंच चुका है। वहीं  हज़ारों विदेशी इसे सीखने के लिए जाने-माने गुरु के पास भारत आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस प्राचीन कला का जन्म हमारे देश में चौथी शताब्दी ई.पू.में हुआ। चौथी शताब्दी ई.पू. में लिखा गया संत पतंजलि का योगसूत्र इसके  शुरुआती ग्रंथों में से एक है। इसका 40 से ज़्यादा भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।

योगा भले ही स्वास्थ्य और शांति का प्रतीक हो लेकिन भारत में इसका इतिहास अशांत रहा है। ब्रिटिश शासन में कला के इस रूप को काफी हद तक हतोत्साहित किया गया, क्योंकि सरकार इसे काला जादू समझती थी। 18वीं और 19वीं शताब्दी के बीच इस परंपरा को राजाओं, गुरुओं और इससे जुड़े लोगों ने फिर से शुरू किया। जब योगा पूरी दुनिया में फैल गया तो इसने अनगिनत लोगों को शांति, स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता की राह दिखाई। सोलवेदा के इस लेख में हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि कैसे यह भारत की सीमाओं से निकलकर दुनिया के बाकी हिस्सों में पहुंचा और कैसे इस यात्रा से अनगिनत लोगों को फायदा हुआ।

विदेशों में योग की इस यात्रा की शुरुआत 1893 से मानी जाती है, जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में विश्व धर्म  सम्मेलन को संबोधित किया। रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद ने जब हिंदू धर्म के आदर्शों,दर्शन और व्यवहार की बात की तो लोग मंत्रमुग्ध हो गए। कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने “ऑरेंज मोंक” को अपने देशों में विचार रखने के लिए भी बुलाया।

1894 में स्वामी विवेकानंद ने न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी की स्थापना की, जो बाद में पश्चिमी दुनिया में फैल गया। फिर वे यहां योग कक्षाएं भी संचालित करने लगे। उन्होंने राजायोग किताब लिखी और पहाड़ियों और कैलिफोर्निया के तटों पर योग रिट्रीट की स्थापना की। उनकी इस पहल से हज़ारों लोग योग से जुड़े। स्वामी विवेकानंद के फॉलोअर्स में जाने-माने दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, वकील और महान वैज्ञानिक जैसे कि निकोलाटेस्ला और लॉर्ड केल्विन भी थे। उन्होंने वह नींव रखी जिसपर आगे चलकर योग गुरुओं ने पश्चिम में अपने ब्रैंड स्थापित किए।

20वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में योगा का फिर से उदय हुआ। तिरुमलाई कृष्णमचार्य को आधुनिक योगा का पिता माना जाता है। उन्हें मैसूर के महाराजा ने योगा का स्कूल खोलने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस कला की ट्रेनिंग देने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके प्रभावशाली छात्रों में पट्टाभि  जोइस, बीकेएस अयंगर और टीकेवी देसीकचार थे। इन्होंने बाद में योगा की अलग-अलग शैलियों की शुरुआत की, जिसमें अष्टांग विनयसा योगा, अयंगर योगा और विनियोगा शामिल है। इससे ये भारत और दुनियाभर में लोकप्रिय हो गए।

बीकेएस अयंगर को पश्चिम में योगा को ले जाना वाला प्रमुख मार्गदर्शक माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने दार्शनिक जिद्दूकृष्णमूर्ति, अमेरिका के वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन, बेल्जियम की रानी एलिज़ाबेथ तक को योग सिखाया। ऐसे लोगों की लिस्ट बहुत लंबी है जिनको यह कला सिखाने के बाद उनकी ज़िंदगी बदल गई। बीकेएस अयंगर की 2014 में मौत हो गई, लेकिन उनकी शैली और परंपरा के बारे में उनकी किताब लाइट ऑन लाइफ में बताया गया है। यह किताब आज भी दुनियाभर के योगियों के बीच काफी लोकप्रिय है।

ऑक्सफोर्ड में शिक्षित योगा शिक्षक कोफी बुसिया ने इनपर एक आत्मकथा ए बायोग्राफी ऑफ बीकेएस अयंगर लिखी, जिसमें उन्होंने बताया कि शुरू में अयंगर के योगा में लचीलापन नहीं था। इस वजह से उनके शिक्षक कृष्णमाचार्य कई बार नाराज़ भी हो जाते थे। हालांकि समर्पण और कई साल की मेहनत के बाद उन्होंने धीरे-धीरे इस कला में महारत हासिल की। यही नहीं इसके साथ उन्होंने कई एक्सपेरिमेंट भी किए। मैसूर विवेकानंद योग शिक्षा और अनुसंधान संस्थान के डॉ. पीएन गणेश कुमार कहते हैं “अयंगर ने कुछ क्रियाओं को आसान बनाने के लिए बेंच, कुर्सियां और तकिए जैसे सामानों का इस्तेमाल करना शुरू किया। इनसे उनकी शैली विदेशियों के बीच हिट हो गई। जबकि पहले विदेशियों ने महसूस किया था कि कुछ योगासन तो बेहद मुश्किल है।”

विदेशियों में अष्टांग विनयसा योग भी बहुत लोकप्रिय हुआ। यह हठ योगा का एक रूप है। पट्टाभि जोइस ने इसकी शुरुआत की। यह आसन सांस के साथ एक खास तरीके से किया जाता है, जिसे उज्जयी पैटर्न कहते हैं। डॉ. कुमार कहते हैं, “काफी ठंडे देशों में रहने वाले लोगों के लिए यह बहुत अच्छा है।” पॉप स्टार मैडोना भी इसकी प्रैक्टिस करती हैं। इसी का असर है कि काफी लोग उज्जयी सांस पैटर्न आसन करने लगे।

कृष्णमाचार्य के बेटे टीकेवी देसीकचार योगी के तीसरे शिष्य थे, जिन्होंने पश्चिम का रुख किया। उन्होंने अपने पिता के ईजाद किए हुए योगा का एक रूप विनियोगा सिखाया। इसे हर प्रैक्टिस करने वाले के शरीर और उसकी ज़रूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। माना जाता है कि देसीकचार ने कहा, “हर चीज़ की तरह इसको भी समझदारी से पेश किया जाना चाहिए। इसे ध्यान से बताया जाना चाहिए। इसे व्यक्ति की आकांक्षा, ज़रूरत और संस्कृति के हिसाब से पेश किया जाना चाहिए।” वास्तव में योगी ने दुनिया को अपने शरीर की आवाज़ सुनने और इसके महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि हम उस चीज़ को अपनाएं जो हमारे लिए फिट बैठती है।

अयंगर, जोइस और देसीकचार पश्चिम में यह कला सिखाने वाले पहले कुछ लोगों में से एक थे। उनके बाद बहुत सारे दूसरे योगा गुरु आए, जिन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फिटनेस और अध्यात्म के बारे में बताया। इसकी वजह से इसे  सीखने के लिए लोग भारत आए। फिर वे दूसरों को यह कला सिखाने के लिए वापस अपने देश लौट गए। बड़ी संख्या में दुनिया के हर शहर में योग एकेडमी खुल रही है, जिससे अब यह अंतरराष्ट्रीय परंपरा हो गई है। हर दिन हज़ारों लोग  इसके अनगिनत फायदे उठा रहे हैं। शायद इससे हमें आध्यात्मिक तौर पर आगे बढ़ने का एक रास्ता मिल गया है। यही एक सपना था जो इन गुरुओं ने इसको लेकर देखा था। आखिरकार इसमें सब कुछ है, स्वस्थ रहने की संस्कृति, अध्यात्म, फिटनेस, जीने का एक तरीका और हां लचीलापन भी।

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