सबसे बेहतर

अरे आईने… यह तो बता, मैं ही सबसे बेहतर हूं न?

नेटवर्किंग वेबसाइटों पर सामाजिक तुलना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, क्योंकि इन साइटों पर लोग अपने आप को बेहतरीन दिखाने के लिए घंटों बिताते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप के युवा शर्मा जी के बेटे की कहानी सुन-सुनकर बड़े हुए हैं। जो हर चीज में सबसे आगे है, वह सबसे अच्छा बेटा है। समय पर खाना खाता है, समय पर सोता है और समय पर ही सारे काम करता है। वहीं, दूसरी ओर जो बच्चे हैं, वह उसकी चमक के पीछे खो जाते हैं। शर्मा जी का बेटा बड़े होते बच्चों के लिए एक ऐसा उदाहरण है, जिसका चेहरा उसे हमेशा दिखाया जाता है।

आज पूरी दुनिया में महिला और पुरुष दोनों ही एक दौड़ में भागते रहने की शिकायत करते हैं। इसके लिए गली-मोहल्ले से लेकर हर शहर और विश्व स्तर की सौंदर्य प्रतियोगिताएं जिम्मेदार हैं। इनके लिए वर्षों तक लोग एक तराशी गयी खूबसूरती का शिकार होते रहते हैं। तुलना करना, बॉस का प्रिय होना, यह हर काम में दिखने लगते हैं।

सोशल मीडिया के कारण अब यह और बढ़ गया है। सोशल मीडिया में लोग लाइक, फॉलो के चक्कर में और उलझते जा रहे हैं। खुद को सबसे बेहतर बनने का प्रचार करने के लिए इनमें और उलझते जा रहे हैं।

सबसे बेहतर कौन है?

वह पतली है, मैं मोटा हूं। वह अमीर और लोकप्रिय है और मैं गरीब और अनजान हूं। वह बुद्धिमान है। मेरा तो आईक्यू ही नहीं है। वह बहुत सुंदर है, मैं बदसूरत हूं। इस तरह से सबसे बेहतर बनने की चक्कर में हम दिन-रात उलझे रहते हैं।

यह माना जाता है कि लोग अपने विश्वास, हुनर और क्षमताओं को आंकने के लिए तुलना पर निर्भर होते हैं। वर्ष 1954 में लियोन फेस्तिंगर ने सामाजिक तुलना सिद्धांत बताया था। इसके अनुसार इंसान खुद को लगातार आंकता रहता है और ऐसा वह सबसे बेहतर बनने के लिए करते रहता है। दो तरीके हैं, जिनके माध्यम से हम लोग तुलना कर सकते हैं। एक है अपवर्ड तुलना और एक है डाउनवर्ड तुलना। अपवार्ड तुलना तब होती है, जब हम उनसे तुलना करते हैं, जो हमसे बेहतर होते हैं। वहीं, डाउनवार्ड वह होती है, जब हम अपने से नीचे से तुलना करते हैं। उदाहरण के लिए, एक डांसर खुद की तुलना एक डांस मंडली की लीडर से कर सकती है और बेहतर कर सकती है। वहीं किसी डांस मंडली का लीडर यदि किसी डांसर से तुलना करेगा, तो उसका प्रदर्शन एकदम बेकार हो जाएगा। हमें खुद के हुनर और खुद के बारे में बेहतर सोचना चाहिए।

क्राइस्ट विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ किशोर अधिकारी कहते हैं कि “हम हर चीज की तुलना करते हैं जैसे कि हमारे पास कैसी चीजें हैं और हमारी नौकरी कैसी है। ठीक है कि कुछ हद तक इनसे हमें खुद को आंकने में मदद मिलती है, तो वहीं अक्सर ऐसा नहीं भी होता है। इससे जलन और घमंड पैदा होता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति सोच सकता है कि उसकी नौकरी उसके दोस्तों की तुलना में काफी कम आकर्षक है, तुलना की तो बात ही छोड़ो, यह सोच ही उसके लिए परेशानियां खड़ी कर सकती है। अगर तुलना का अंत किसी विचार में होता है, तो कोई समस्या नहीं है, मगर जो विचार आए वह आलोचनात्मक नहीं होना चाहिए।”

देखा जाए, तो तुलना किसी भी व्यक्ति की क्षमताओं के आधार पर होती है और इसमें कुछ गलत नहीं भी है। समस्या तब पैदा होती है, जब हम कोई लाइन नहीं खींचते और बेकार की  तुलना करते हैं। सबसे बेहतर बनने के चक्कर में गैर जरूरी तुलना इंसान को हमेशा परेशान करता है। तुलना के अपने खतरे होते हैं जैसे- खुद पर अंसतोष, समय का नष्ट होना आदि।<br>आइये! हम इससे होने वाले नुकसान देखते हैं :

अंतहीन दौड़

हम कई तरीकों से तुलना कर सकते हैं। जब भी हम खुद का आकलन दूसरों के साथ करते हैं, तो हम किसी निष्कर्ष पर आते हैं। हम उन नतीजों के साथ दूसरी तुलना में फंस जाते हैं। यह एक अंतहीन दौड़ है, जिसका कोई अंत नहीं है। हम अपना समय और ऊर्जा दोनों नष्ट करते हैं, लेकिन हमें इससे मिलता कुछ भी नहीं है। तो सबसे बेहतर बनने के लिए आकलन करिए, लेकिन इसकी आदत नहीं बनाइए।

फायदा कम, नुकसान ज्यादा

हमें तुलना से फायदा बहुत कम मिलता है। जैसे ही हम तुलना में सुख ढुंढ़ना शुरू करते हैं, वैसे ही सबसे बेहतर खुद को नहीं पाने पर असंतोष से भर जाते हैं। केवल एक ही तुलना ऐसी है, जिसमें हमें सुख मिल सकता है और वह है अपने आप से तुलना। जब हम दिनों दिन नया कुछ सीखते हैं और नए कौशल हासिल करते हैं। जो हमारे पास है, उसे सम्मान देते हैं, तो हम आगे बढ़ते हैं।

कोई नियत मानक नहीं

तुलना के लिए एक मेट्रिक सिस्टम की जरूरत होती है, फिर भी हम सबसे ज्यादा सब्जेक्टिव चीजों के बीच तुलना करते हैं। जैसे खूबसूरती, संगीत या किताब  में रुचि इंसान की रुचि पर निर्भर होती है। यह पता लगाना बहुत मुश्किल है कि कौन सी रुचि बेहतर है। फिर भी लोगों को उनके लुक और पसंद के आधार पर आंका जाता है। इसे समझने की कोशिश कीजिए कि तुलना करने के कोई मानक नहीं हैं। सबसे बेहतर बनने के चक्कर में दूसरों से तुलना करके खुद में असंतोष को पैदा करते हैं।

फूल कई तरह के होते हैं 

हर बार हम गलत तुलना करते हैं, हम गुलाब की तुलना लिली से करते हैं, जो एकदम दो अलग-अलग प्रजाति के फूल हैं। दोनों ही खूबसूरत हैं और दोनों में अपनी-अपनी खुशबू है। इन दोनों की तुलना कब और कैसे हो सकती है, यह भी एक यक्ष प्रश्न ही है।

हर इंसान अपने आप में खास है। हर सभी सेब और संतरे हैं, गुलाब और लिली हैं, तो अब सोचिए कि हम सभी के बीच तुलना कितनी बेवकूफी भरी होगी और इसका अंत भी बेकार ही होता है। हमें खुद की और दूसरों की खासियत समझनी होगी और केवल तभी हम इस तुलना नामक शैतान से लड़ सकते हैं।

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