बच्चों में चिड़चिड़ापन

बच्चों में चिड़चिड़ापन को समझें

बचपन में चिड़चिड़ा होना स्वाभाविक है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बच्चों में चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन किसी अन्य गहरी बात का संकेत भी हो सकता है।

वयस्क लोग इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि बच्चों का सही पालन-पोषण जीवन की सबसे अहम जिम्मेदारी होती है। ऐसा करने से हमें खुशी के साथ-साथ एक कड़ी सीख भी मिलती है। आप त्याग करने की भावना को ही नहीं समझते, बल्कि दूसरों की इच्छा और जरूरतों के लिए अपनी इच्छा और जरूरतों की कुर्बानी देना भी सीखते हैं। आपको यह करना नहीं पड़ता, लेकिन आप ऐसा करना चाहते हैं। यह बात ऐसा है मानो अभिभावक बनते ही आपमें एक खास संवेदना पैदा हो जाती है, जो आपके भीतर बैठे अनूठे ‘लव’ स्विच को ऑन कर देती है। यह स्विच आपको एक ऐसा सुपर पावर देता है जो आपको अपनी क्षमताओं को पार करने, डर से आगे बढ़ने में सहायता करता है। आप किसी भी चुनौती को स्वीकारने के लिए तैयार होते हैं। माता-पिता बनने से आपमें जो ऊर्जा आती है वह किसी भी अन्य रिश्ते को लेकर नहीं देखी जा सकती।

इस रिश्ते में एक अन्य इंसान आपके जीवन का केंद्रबिंदु बन जाता है। उस इंसान का जिक्र होते ही आप वह सब करने को तैयार हो जाते हैं जो पहले असंभव लगता था। उस इंसान के लिए आप अपना सब कुछ सहर्ष लुटाने के लिए तैयार हो जाते हैं। आप अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कान देखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

इसके बावजूद एक दिन इस प्यार, स्नेह और लाड़-दुलार के शानदार स्वर्ग में एक संकट आता है। आपको लगता है कि आपका बच्चा हाथ से निकलता जा रहा है। आप सोचते थे कि एक अभिभावक होना बहुत ही फायदेमंद और समृद्ध करने वाला अनुभव है। खैर, अब यह आपको एक ऐसा हुनर लगता है जो बहुत ही कम लोगों के पास होता है। आप अपनी सारी बुद्धि लगा लेते हैं, मगर आपके छोटे शरारती बच्चे के सामने आपकी हर कोशिश बेकार हो जाती है। जैसे अब आपका बच्चा एक ऐसा टीचर बन गया है जो आपके सब्र का इम्तिहान ले रहा है। आप सब कुछ सही कर रहे हैं मगर सब कुछ गलत हो रहा है। आखिर हो क्या रहा है? यह सोचकर आप हैरान होते हैं। आपकी मंशा चाहे कितनी भी साफ हो, आपकी जानकारी कितनी भी सटीक क्यों न हो, आप खुद अपने बच्चों में चिड़चिड़ापन के सामने हाथ टेक देते हैं।

बच्चों में चिड़चिड़ापन की जांच करने पर हमें पता चला कि मामला जितना दिखाई देता है उससे ज्यादा गंभीर है। बच्चों के स्वभाव में जो झुंझलाहट है वह बचपन में आम बात मानी जाती है, लेकिन हो सकता है कि यह किसी और गंभीर समस्या का संकेत या फिर डिप्रेशन का मामला हो। मनोचिकित्सक बच्चों के केयरटेकर को सलाह देते हैं कि उन्हें बच्चों के बर्ताव के हर संकेत पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि कभी-कभी यह संकेत खतरनाक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अभिभावक या केयरटेकर के प्रति गुस्सा, तोड़फोड़ करने का स्वभाव, चिल्लाना, चीज़ें फेंकना, मनचाही चीज़ें न मिलने पर मचलना, दीवार पर सिर पटकना, खुद को तब तक काटना और खुजलाना जब तक खून न निकलने लगे और खुद या दूसरों को कुछ ऐसा बोलना, जिससे बात सीधी दिल पर लगे।

बच्चों में चिड़चिड़ापन क्यों?

बच्चों में चिड़चिड़ापन की आदत एक से सात वर्ष तक के बालकों में पनपती है, क्योंकि इसी समय में वे खुद को परिवार का केंद्रबिंदु मानते हैं। चिड़चिड़ाहट या झुंझलाहट दिखाकर ही बच्चा अपना गुस्सा दुनिया के सामने व्यक्त करता है। उसके आसपास की चीज़ों पर उसका नियंत्रण न होना और खुद के साथ अन्याय होने की भावना रखने के कारण बच्चा इस तरह का व्यवहार करता है। बच्चे का यह व्यवहार हो सकता है, इस बात का संकेत हो कि वह अपने गुस्से जैसी भावना को नियंत्रित नहीं कर पाता। मनोचिकित्सक तिश्या महिंद्रु शाहनी बताती हैं कि, ‘बच्चों में चिड़चिड़ापन इस बात का संकेत है कि बच्चे को यह लगता है कि वह जो चाहता है या फिर जिसपर उसका हक है उससे उसे जानबूझकर दूर रखा जा रहा है। यह उसकी मनपसंद कुकी या बिस्किट, वीडियो गेम या नया खिलौना कुछ भी हो सकता है।’

क्या कोई हल है 

इस समस्या का समाधान यकीनन सरल नहीं है। इसके लिए आपको बच्चे के दिमाग को शांति और सब्र के साथ समझना होगा। बच्चों के मानसिक कल्याण केंद्र, ‘अपनत्व’ की संस्थापक शाहनी सलाह देती हैं कि बच्चों में चिड़चिड़ापन व भावनात्मक विस्फोट होने पर उनके साथ कैसे निपटना चाहिए।

1. शांत रहें, अगर मुमकिन हो तो जो काम आप कर रहे हैं, उसमें बच्चों की चिड़चिड़ापन या झुंझलाहट को बीच में न आने दें। न ही बच्चे पर गुस्सा करें या उसे धमकाएं। इससे बच्चों को यह संदेश मिलेगा कि ऐसा करने से कुछ नहीं होगा। बच्चे के शांत होने का इंतजार करें और फिर उसके साथ इस पर बात करें।

2. जो वह कर रहा है उसे अनदेखा करें और ऐसा दिखावा करें जैसे कि कुछ हो ही नहीं रहा है।

3. सेटिंग और मूड को बदलें। बच्चे को किसी दूसरे कमरे/जगह पर ले जाएं। अगर आप सार्वजनिक स्थान पर हैं तो बच्चे के नखरे पर तब तक ध्यान न दें जब तक कि वह खुद को या किसी और को नुकसान न पहुंचाए। ऐसे समय में सबसे बेहतर होगा कि जो आप कर रहे हैं उसे रोक दें और चले जाएं।

4. बच्चों में चिड़चिड़ापन को रोकने के लिए बच्चे को पढ़ने या गेम खेलने या बेवकूफी वाले चेहरे बनाने में व्यस्त कर दें।

5. बच्चे की फ्रस्टेशन को समझें। बच्चे को यह जानने दें कि आप उनकी भावनाओं को समझते हैं। यह एहसास उन्हें शांत करने में मदद करता है, खासतौर पर जब वह आपका ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहता हो।

6. बच्चे के अच्छे व्यवहार की तारीफ करें। यह उन्हें और अच्छा व्यवहार करने के लिए प्रेरित करेगा। इससे बच्चों में चिड़चिड़ापन दूर होगा।

यह देखते हुए कि बाल मनोविज्ञान इतनी सूक्ष्म जानकारी देता है, आपको हैरानी हो सकती है कि छोटे बच्चों के साथ व्यवहार करना इतना मुश्किल कैसे हो सकता है? जब हम छोटे बच्चे थे तो हमारे माता-पिता के पास हमारे नखरों को समझने के लिए आवश्यक दिमागी ताकत (मेंटल बैंडविथ) नहीं थी। हालांकि अब समय बिलकुल बदल गया है और माता-पिता बनना जितना सरल काम एक गंभीर और विचारशील व्यवहार (कंटेंप्लेटिव अप्रोच) बन गया है। हमें इस बदलते माहौल को भी ध्यान में रखना चाहिए, जिससे बच्चे आज रू-ब-रू हो रहे हैं। आज बच्चे जिस दुनिया में रह रहे हैं, उसमें अभिभावकों का दायित्व काफी बढ़ गया है।

आखिरकार, हम मानते हैं कि बच्चों का पालन पोषण एक ऐसी जिम्मेदारी, एक ऐसा अधिकार है जो आपको बिना किसी कारण के मुस्कुराना सिखाता है।

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