झूठ बोले कौवा काटे

झूठ बोले कौवा काटे…

झूठ बोले कौवा काटे… ये कहावत तो आप सभी ने सुनी ही होगी। क्या आपने कभी सोचा है कि लोग झूठ क्यों बोलते हैं? झूठ बोलने से जुड़े पहलुओं को जानने के लिए पढ़ें ये लेख।

बचपन से हमें सिखाया गया है कि झूठ बोले कौवा काटे के समान है, यानी झूठ बोलना बुरा और सच बोलना अच्छा होता है। जब हम अपने अध्यापकों या माता-पिता से झूठ बोलते हैं, तो हमें फटकार लगाई जाती है और जब सच बोलते हैं, तो वाहवाही मिलती है। जीवन के आरंभिक वर्षों में हमें सच बोलने की आदत हो जाती है। लेकिन बड़े होते ही हम पाते हैं कि राजा हरिश्चंद्र बनना कई बार हमें संकट में डाल देता है। कम से कम युवाओं के बारे में तो हम कह ही सकते हैं कि हर कोई झूठ बोल ही देता है। यही क्यों, ईमानदारी व सज्जनता का जीवन जीने वालों को भी कभी न कभी संकट या शर्मिंदगी से बचने के लिए झूठ बोलना ही पड़ता है। इतना ही नहीं, किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे इसके लिए भी हम सफेद झूठ बोल देते हैं।

हममें से बहुत से लोग तो छोटी-मोटी बातों को लेकर सदा झूठ बोलते ही रहते हैं। लेकिन, यहां भी झूठ बोले कौवा काटे की पंक्तियां सटीक बैठती है। अपने लोगों से झूठ बोलने पर हम मुश्किल में फंस जाते हैं और कभी-कभार हमें इसके गंभीर परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं। हां, अपवाद तो इसके भी होते हैं। कुछ लोग तो अपने प्रियजनों से भी सफेद झूठ बोलते ही रहते हैं। उन्हें आदतन झूठा कहा जा सकता है। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं होती, ना ही उसका कोई निदान किया जा सकता है। यह आत्ममुग्धता हो सकती है या अपने को बड़ा समझने के अहंकार का परिणाम हो सकता है। मनोवैज्ञानिक इसे बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (बीपीडी) कहते हैं।

वैसे लोग जो झूठ बोले कौवा काटे जैसी पंक्तियों से सरोकार नहीं रखते हैं, उनके लिए छोटे-मोटे झूठ को ‘सामान्य’ बात समझ लेना या स्वीकार कर लेना आसान होता है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन के एक अध्ययन में यहां तक कहा गया है कि ‘‘झूठ बोलना जीवन का एक हिस्सा ही है!’’ यह अध्ययन दो समूहों पर किया गया। एक था महाविद्यालय के छात्रों का समूह व दूसरा था समाज के अन्य लोग। अध्ययन में कहा गया है, ‘‘सामुदायिक अध्ययन में भाग लेने वालों ने बताया कि वे दिन में औसतन एक बार तो झूठ बोलते ही हैं; वहीं कॉलेज के छात्रों ने कहा कि वे दिन में एक-दो बार झूठ बोलते हैं।’’ ये झूठ कितने गंभीर थे, यह प्रश्न थोड़ा अलग है। इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि महत्त्वपूर्ण मामलों में झूठ बहुत कम ही बोला जाता है। लिहाज़ा, वैज्ञानिकों ने हाल के शोध में पता लगाया है कि हर झूठ – छोटा हो या बड़ा – मस्तिष्क में बदलाव लाता है। नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस के निदेशक डॉ. बीएन गंगाधर कहते हैं, ‘‘झूठ बोलने से अपराध बोध जागता है, जिससे तनाव बढ़ता है। इससे मस्तिष्क का वाताम वाला हिस्सा जिसे अंग्रेजी में एमिग्डला कहते हैं उत्तेजित हो जाता है। मस्तिष्क का यह भावुक हिस्सा होता है। इसलिए झूठ बोलने से शरीर में विपरीत बदलाव आते हैं।’’ साइंटिफिकली भी झूठ बोले कौवा काटे सार्थक साबित होता है।

तनाव से मस्तिष्क पर कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं, इस बात हम लोग भली भांति परिचित हैं। झूठ बोलने की सामान्य आदत जब बेईमानी की हद तक पहुंच जाती है, तो मस्तिष्क व शरीर पर तनाव की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के वैज्ञानिकों ने अध्ययन में इन परिणामों के बारे में बताया है कि दरअसल झूठ बोलने से क्या होता है। स्वार्थ, जालसाजी और बेवफाई के कारण झूठ बोले जाने से दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं, रक्तचाप बढ़ जाता है, रक्तवाहिनियों में सिकुड़न आ जाती है, तनाव-हार्मोन कोर्टिसोल में वृद्धि होती है व भावनाओं तथा मन को नियमित रखने वाला मस्तिष्क का हिस्सा बहुत थका-सा महसूस करता है।

आदतन झूठ बोलने वालों पर होने वाले सीधे और दीर्घावधि परिणामों का अभी पता लगना बाकी है। लेकिन हम जानते हैं कि रक्तचाप बढ़ने, दिल की धड़कनें तेज़ होने व कोर्टिसोल के बढ़ने का लंबे समय में स्वास्थ्य पर गहरा और विपरीत असर होता है।

यही नहीं, कुछ अध्ययनों से यह भी पता चला है कि जब कोई लम्बे समय तक झूठ बोलता रहता है या बेईमानी में लगा रहता है, तो उसका मस्तिष्क ऐसी बातों का अभ्यस्त हो जाता है। फिर हर झूठ या हर बेईमानी के प्रति मस्तिष्क संवेदना खो देता है और इसलिए ऐसा बर्ताव सहज लगने लगता है। इसका अर्थ यह है कि हम जितना अधिक झूठ बोले, वह उतना ही आसान लगने लगता है। डॉ. गंगाधर का कहना है, ‘‘आदतन झूठ बोलने वाला व्यक्ति दूसरों की परवाह नहीं करता और भावनात्मक रूप से बेखबर होता है।’’

सच बोलना, दूसरों की मदद करना व ईमानदारी का जीवन जीना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की बुनियाद है। बेईमानी का जीवन अंत में आपका ही नुकसान करता है, यह झूठ बोले कौवा काटे की पंक्तियों पर सार्थक बैठता है। रोज छोटे-मोटे झूठ बोलने से कोई समस्या महसूस न होती होगी लेकिन लम्बे समय में इसके स्वास्थ्य पर विपरीत असर होते ही हैं। छोटे-मोटे झूठ बोलने की आदत हो जाए, तो मस्तिष्क इसका अभ्यस्त हो जाता है और इससे हम अपनी नैतिकता खो देते हैं।

हो सकता है हममें से कुछ लोग इसे स्वीकार ना करें। हम कह सकते हैं कि ये तो छोटे-मोटे झूठ हैं, जिसका कोई विशेष महत्त्व नहीं है। लेकिन, सच्चाई यह है कि एक झूठ से बचने के लिए हमें कई झूठ बोलने पड़ते हैं और जब तक हमें इसका आभास होता है तब तक हम इतने झूठ बोल चुके होते हैं कि संकट खड़ा हो जाता है। अगली बार जब कभी हम उलझन में हों, तब याद करें कि बचपन में हमें क्या सिखाया गया था… यानी झूठ बोले कौवा काटे। हम झूठ बोलकर तनाव व अपराध बोध का बोझ ढोने की बजाय सच कहकर स्थिति का अच्छी तरह से सामना कर सकते हैं।

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