शंकराचार्य मंदिर

शंकराचार्य मंदिर और एकता का संदेश

शंकराचार्य मंदिर के बारे में कहा जाता है कि संत आदि शंकरा 9वीं शताब्दी में गोपाद्री पहाड़ी पर स्थित जितेश्वर मंदिर में रहते थे। उनके जाने के बाद पहाड़ी और मंदिर का नाम 'शंकराचार्य' रखा गया।

कश्मीर पहाड़ों, रंगीन चीड़ के पेड़ और शीशे जैसी पारदर्शी जल धाराओं के कारण धरती पर स्वर्ग कहलाता है। यह जन्नत ना केवल अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए मशहूर है, बल्कि आध्यात्मिकता का ठिकाना भी है।

कश्मीर, जिसे पीर वेर या ऋषि वेर (सूफियों और संतों के रहने के लिए गुफा) के रूप में जाना जाता है, एक बार नौवीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत आदि शंकर के प्रचारक की मेजबानी किया था। ऐसा कहा जाता है कि गोपाद्री पहाड़ी पर स्थित जितेश्वर मंदिर में संत निवास करते थे। उनके जाने के बाद उस पहाड़ी और मंदिर का नाम ‘शंकराचार्य’ रखा गया। जहां शंकराचार्य मंदिर है।

जब से मैंने अपने दोस्त से इस मंदिर के बारे में सुना था, तब से मैं इसे देखना चाहती थी। हाल ही में कश्मीर की यात्रा (Kashmir ki yatra) के दौरान मैंने डलगेट से शंकराचार्य हिल तक के लिए टैक्सी ली। मुझे बताया गया था कि यह मंदिर 1,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। 30 मिनट की पहाड़ी पर ड्राइव ख़त्म करके और उस दौरान चक्कर आने और जी मितलाने पर काबू पाकर और टैक्सी से बाहर निकलने पर मैं बहुत खुश थी। लेकिन मुझे पता नहीं था कि मेरी यह राहत थोड़ी देर के लिए है, क्योंकि मंदिर तक पहुंचने के लिए अभी 243 सीढ़ी और चढ़नी थी।

शंकराचार्य मंदिर (Shankaracharya Temple) की ओर जाते हुए रास्ते में मुझे एक साथी मिले, उन्होंने अद्वैत वेदांत दर्शन को सरल शब्दों में मुझे समझाया। उन्होंने कहा हम सब के भीतर मौजूद आत्मा नामक आंतरिक चेतना है। यह आत्मा ब्रह्म नामक सार्वभौमिक चेतना का अंश है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि जीवन का लक्ष्य आत्मा के माध्यम से ब्रह्म को जानना है। दर्शन के अनुसार, जब कोई व्यक्ति आत्मा की प्रकृति को समझेगा, तो वे सभी अस्तित्वों के परस्पर जुड़ाव को समझेगा। दर्शन हमें हमारे मतभेदों से परे देखना, जातीय भेदभाव को त्यागना सिखाता है और हमें यह एहसास दिलाता है कि हम सब एक हैं।

सरल शब्दों में, इस विचारधारा के लोगों का मानना है कि आपने और मैंने इस पृथ्वी पर अपनी अलग-अलग पहचान बनाई हुई है। मैं अपने आप को एक डॉक्टर के रूप में पहचान सकता हूं। आप एक इंजीनियर के रूप में। मैं अपने आप को एक भारतीय कह सकता हूं, आप एक अमेरिकी। लेकिन इन सभी सतही और मानव निर्मित मतभेदों के नीचे झांकने पर पता चलता है कि हम सब मौलिक रूप से एक हैं।

जैसे ही मैं शंकराचार्य मंदिर के शीर्ष पर पहुंचा, तो वहां आदि शंकर की संगमरमर की प्रतिमा ने मेरा स्वागत किया। मैंने ऊपर बरामदे में मुख्य मंदिर में जाने से पहले श्रद्धापूर्वक आदि शंकर की प्रतिमा के सामने अपना सिर झुकाया। ऊपर बरामदे में ऐसे कई कोण थे, जहां से कोई भी श्रीनगर शहर को वहां से देख सकता था। 13 पत्थर की सीढ़ियां लांघकर मैं एक छोटे से गोलाकार कमरे में पहुंची, जो कि मंदिर का मुख्य कक्ष था। मंदिर में प्रवेश करते ही मुझे वहां एक शिवलिंग दिखा, जिसे देखते ही मेरा मन भावविभोर हो उठा। यह शिवलिंग मुझे ब्रह्म के अमूर्त प्रकृति का प्रतिबिंब लग रहा था।

दर्शन करने के बाद मैं बरामदे के कोणों से वहां का नज़ारा देखने चली गई। अब मुझे शांत नागिन झील और शोरगुल से भरी डल झील के बीच कोई अंतर नहीं लग रहा था। अब मैं श्रीनगर में उन जगहों, भीड़-भाड़ वाले लाल चौक या आलीशान राजबाग, जहां से मैं आई थी, को नहीं पहचान सकती थी। ऐसा लग रहा था मानो मेरी इंद्रियों ने अंतर करने की क्षमता खो दी हो। मैं केवल एक ही चीज़ देख सकती थी और वह था श्रीनगर शहर

एक ठंडी हवा के झोंके ने मुझे मेरी सपनों की दुनिया से निकाल कर वापस हकीकत में पहुंचा दिया। मुझे मेरी आत्मा को खोजने या ब्रह्म का अनुभव करने से पहले अभी लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है। लेकिन शंकराचार्य पहाड़ी और मंदिर की यात्रा ने निश्चित रूप से मुझे सार्वभौमिक परस्परता और एकता का मार्ग दिखा दिया। इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि हमें अपने मतभेदों को परे रखना चाहिए और अपनी सोच को बड़ा रखना चाहिए।

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