दिव्यांग

दिव्यांगता को मात देकर छू लिया आसमां

रोग और दिव्यांगता इंसान के जीवन का हिस्सा हैं। फिर भी कुछ ऐसी कहानियां हैं, जिनमें लोग अपनी अद्भुत दृढ़ता के साथ इन खामियों पर विजय पा लेते हैं।

महज 21 वर्ष की आयु में ही मोटर न्यूरॉन नामक बीमारी से पीड़ित होने का पता चलने पर स्टीफन हॉकिंग हार मान लेते, तो हमें ब्लैक होल और क्वॉन्टम ग्रैविटी के बारे में शायद कभी पता नहीं चलता। न ही जन्म से बधिर बीथोवेन ने संगीत की महान कृति फर एलिस का सृजन कर हमें आनंदित किया होता। उन्होंने न जाने कितनी खूबसूरत वाद्य संगीत की रचनाएं की हैं।

रोग और दिव्यांगता इंसान के जीवन का हिस्सा हैं। जानलेवा बीमारी से होने वाली परेशानी हमें हताश और हारा हुआ महसूस करवाती है। फिर भीकुछ ऐसी कहानियां है, जिसमें लोग अपनी अद्भुत दृढ़ता के साथ इन खामियों पर विजय पा लेते हैं। आप पूछ सकते हैं कि दिव्यांगता (Handicapped) या विपरीत परिस्थितियों से उबरने की यह क्षमता कैसे प्राप्त होती है? यह कभी न हार मानने वाली मानवीय प्रवृत्ति है, जो हमें हमारे समक्ष आने वाली चुनौतियों से निपटने की शक्ति देती है।

दिव्यांगता के बाद भी है असीम संभावनाओं की दुनिया (Divyangta ke baad bhi hai asim sambhawnaon ki duniya)

जब भौतिक शास्त्री और ताराविज्ञानी स्टीफन हॉकिंग को घातक बीमारी एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) होने का पता चला तब वह केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे थे। इस डॉक्टरेट छात्र का भविष्य इसकी वजह से धूमिल हो गया। दिव्यांगता के कारण डॉक्टरों ने उन्हें सिर्फ एक साल तक ही जीवन की उम्मीद दी थी।

जब हम एएलएस के साथ हॉकिंग की लड़ाई को देखते हैं,  तो उनका आशावाद और ज्ञान पाने की लालसा पर ही हमारी निगाह पड़ती है। एक अहम घटना ने उनकी जीने की इच्छा को और भी प्रबल किया था। अस्पताल में विभिन्न टेस्टों से गुजर रहे प्रोफेसर हॉकिंग ने ल्यूकेमिया (रक्त का कैंसर-leukemia) से एक युवा लड़के को मरते देखा। इसे याद करते हुए हॉकिंग ने एक बार कहा था, ‘जब भी मुझे अफसोस और दुख होता है, मैं उस छोटे लड़के के बारे में सोचने लगता हूं, जो उस दिन मर गया था।’

बाधाओं से पार पाना

यह विडम्बना ही है कि मनोविश्लेषण के जनक सिग्मंड फ्रायड डिप्रेशन, चिंता और निराशा से पीड़ित थे। डिप्रेशन को भगाने के लिए उन्होंने कोकेन का उपयोग शुरू कर दिया।

‘अर्नेस्ट जोन्स द लाइफ एंड वर्क ऑफ सिग्मंड फ्रायड’ में फ्रायड ने लिखा है कि कोकेन से उनमें उत्साह भरता था। इसके बाद उन्होंने संगीत और साहित्य में उत्साह की तलाश की। हालांकि कोकेन के दुष्प्रभाव की जानकारी मिलने पर उन्होंने इससे तौबा कर लिया।

अंत में उन्होंने आत्म विश्लेषण किया जो काफी प्रभावी साबित हुआ। लेकिन, फ्रायड की ज़िंदगी को बदलने का काम उन्हें मिली प्रतिष्ठा ने किया। ड्रीम वकामुकता पर उनका काम सराहा गया व उन्हें इंटेलेक्चुअल ग्रुप (बौद्धिक समूह) का नेतृत्व करने को कहा गया।

जहां शब्द हारे, वहां संगीत जीता

इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा कि कोई संगीतकार अपनी ही धुनों को न सुन पाए। विलक्षण संगीतकार लुडविग वान बिथोवेन के साथ प्रकृति ने यह काम किया था।कान किसी भी संगीतकार की आत्मा होती है। दुर्भाग्यवश, टिनिटस (मरीज के कान में अतिरिक्त गुंजन की बीमारी को टिनिटस कहते हैं) की वजह से बिथोवेन बधिर हो गए। बहरेपन के साथ उनका संघर्ष उनके संगीत की तरह ही प्रसिद्ध है। अन्य रचनाकारों से प्रेरणा प्राप्त करने में सक्षम नहीं होने, अपने विचारों, भय और आशाओं को व्यक्त न कर पाने, अपनी वर्तमान परिस्थिति का मुकाबला न कर पाने के कारण इन बातों का बुरा प्रभाव उनके जीवन पर भी पड़ा। इस दिव्यांगता के चलते वे आत्महत्या का विचार करने लगे।

विपरीत परिस्थिति में खुद को संभालने के उनके संकल्प ने ही उन्हें असाधारण बनाया। अपनी दृढ़ता के बल पर ही वे इन विपरीत परिस्थितियों को एक महान उपलब्धि में परिवर्तित करने में सफल हो पाए। चूंकि वह अपने समकक्षों को सुन नहीं सकते थे, इसलिए वे निष्प्रभावी मौलिक रचनाओं को सृजित करने में सफल रहे।

इस संदर्भ में यहां एक छोटी-सी कहानी का उल्लेख करना उचित रहेगा। जब बिथोवेन ने अपनी महान रचनाओं में से पहली रचना सिम्फनी 9 की प्रस्तुति दी, तब तक वे पूरी तरह से बधिर हो चुके थे। जब यह प्रस्तुति संपन्न हुई तब वहां बैठे दर्शकों से उन्हें अभूतपूर्व प्रशंसा मिली, लेकिन वे इससे अनजान ही रहे। तब एक एकल कलाकार ने उन्हें दर्शकों की ओर मुखातिब किया। इस तरह संगीत के इतिहास में सर्वाधिक जीवंत पलों का निर्माण हुआ।

असाधारण आंतरिक शक्ति की ऐसी कहानियों ने इतिहास रचा है। दिव्यांग होने के बावजूद शक्तिशाली दिलों और बुलंद आत्माओं के साथ पुरुषों और महिलाओं ने अछूती पगडंडियों पर अपनी छाप छोड़ी है और चाहे कितनी भी पीढ़ियां आएं और जाएं, इनकी विरासत युगों तक ऐसे ही चमकती रहेगी।

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