वह एक खूबसूरत शाम थी। सूर्य विदा हो चुका था, आसमान में तारे उसे विदा करने के लिए निकल आए थे। ऐसा लग रहा था मानों उस वक्त सभी एक दूसरे को अलविदा कह रहे थे।
गुरूदेव साधु वासवानी भी उस दिन शाम को घूमने के लिए निकले थे। गुरुजी हमें तारों और नक्षत्रों से भी परे की दुनिया के बारे में बता रहे थे। उस दुनिया के बारे में, जहाँ हमारी आत्मा का वास होता है, हम उस राह से भटक गए हैं।
वापस लौटते हुए– हमें राह में एक मासूम बच्चे की पुकार ने रोक लिया। वह कह रहा था दादाजी कृपया रुक जाइए, मुझे आपके पास आकर आपका आशीर्वाद लेना है।
साधु वासवानी तो बच्चों को दिलोजान से प्यार करते थे। वे उस बच्चे की आवाज़ पर वहीं रुक गए। बालक दौड़ता हुआ आया और हाथ जोड़ कर उनसे आशीष माँगने लगा। साधु वासवानी ने उस बच्चे की निर्मल आंखों में देखते हुए पूछा– बेटा! तुम कहां रहते हो?
बालक ने कहा:– दादाजी यहीं नाना पेठ में। क्या आप मेरे घर मेरी बीमार माँ को देखने चलेंगे? उसे आशीष देंगे?
साधु वासवानी ने कहा– बेटा, आज नहीं, किसी और दिन अवश्य आऊँगा! यहां से पहले तुम कहां रहते थे?
बालक– यहाँ से पहले हम शिवाजी नगर में रहते थे।
साधु वासवानी:– उससे पहले कहाँ रहते थे?
बालक:– बड़ौदा में रहते थे।
साधु वासवानी:– बड़ौदा से पहले कहां रहते थे?
बालक:– भारत के विभाजन से पहले हैद्राबाद सिंध में, मेरा जन्म वहीं हुआ था।
साधु वासवानी:– तुम्हारे जन्म से पहले तुम कहां थे?
बालक तो नासमझ था। वो समझ नहीं पाया कि ये मुझसे ऐसे प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं? उसने बड़े भोलेपन से जबाव दिया– मुझे तो आपके प्रश्नों का उत्तर मालूम नहीं है। मैं अपनी माँ से पूछकर आपको बताऊंगा।
यह सुन कर हम सभी गुरुदेव के साथ हंस पड़े। उन्होंने गंभीर होकर कहा– हमारे स्कूलों में सब कुछ पढ़ाया जाता है, लेकिन स्वयं को पहचानना नहीं सिखाया जाता।
कालांतर में जब सेंट मीरा स्कूल के प्रधानाध्यापक ने मुझ से स्कूल के लिए कोई आदर्श वाक्य के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें गुरुदेव का वही मंत्र दे दिया–
“ओ मुसाफिर, तेरा घर तुझे कब से ढूंढ रहा है।“जब बच्चे इस बोध-वाक्य को बार-बार दुहराएँगे तो उनके अंदर एक चिंतन जागेगा, पिछले जन्मों की स्मृतियां जागेंगी और वे अपने असली घर, अपनी आत्मा तक पहुँच जाएंगे।
साधु वासवानी अपने उपदेशों में बार-बार कहते थे कि– हम सब को हमेशा खुदसे पूछते रहना चाहिए कि– मैं कौन हूं? मुझे कहां जाना है? हर दिन इन प्रश्नों का उत्तर चितंन-मनन के द्वारा ढूंढने का प्रयास करो। तुम्हें अपने उत्तर दिमाग में नहीं, दिल के अंदर मिलेंगे…जहां आत्मा के दिव्य प्रकाश की जगमगाहट होगी।
जब तुम अपनी आत्मा को जान लोगे तो तुम्हें उस दिव्य परमात्मा की शक्ति का भी एहसास हो जाएगा…जिसने इस ब्रह्मांड को धारण कर रखा है…वे स्वयं तुम्हारे सामने प्रकट हो जाएंगे।
वे अपनी एक उंगली आसमान की ओर उठा कर कहते थे– देखो ये सारा ब्रह्मांड अपनी आत्मसेवा में लगा रहता है। ये सारे तारे-सितारे अपनी आत्मा के अनुरूप अपने कर्तव्य करते रहते हैं। इसलिए तुम भी भौतिक सुखों का मोह त्याग कर, अपनी आत्मा में बसे परमात्मा को जानो और अपने कर्तव्यों की पूर्ति में लगे रहो। जब तुम्हें यह बोध हो जाएगा तो तुम सारे विकारों से मुक्त होकर एक नक्षत्र की तरह जगमगाने लगोगे।