न्यायशील प्रभु

क्या प्रभु न्यायशील हैं?

हम कठिन समय से भी गुज़रते हैं और खुशियों से भरी बहारें भी आती हैं। जीवन की राह पर चलते हुए, कभी ऐसी घड़ी भी आती है जब हमारे मन में यह प्रश्न उठता है, क्या प्रभु न्यायशील हैं?

लोगों तक आशा, प्रेम और शांति से भरा अध्यात्म का संदेश पहुंचाने के लिए, जब मैं जगह-जगह जाकर लोगों से मिलता हूं, तो प्रायः लोग मुझसे यह प्रश्न पूछते हैं कि क्या प्रभु न्यायशील हैं? इस पृथ्वी पर हमारा जीवन प्रिय एंव अप्रिय दोनों प्रकार के अनुभवों से भरा होता है। हम कठिन समय से भी गुज़रते हैं और खुशियों से भरी बहारें भी आती हैं। जीवन की राह पर चलते हुए, कभी ऐसी घड़ी भी आती है जब हमारे मन में यह प्रश्न उठता है, क्या प्रभु न्यायशील हैं?

जीवन में ऐसा वक्त आता है, जब हम खुश होते हैं, हम हंसते हैं, गाते हैं, जो कुछ जैसा है हम उससे सतुंष्ट रहते हैं, हर वस्तु अपने अनुकूल लगती है। हमें जो कुछ चाहिए, जो कुछ हम चाहते हैं, वह सब पाते हैं। हम कह उठते हैं प्रभु उदार हैं, महान हैं। पर जीवन में ऐसा भी वक्त आता है, जब सब कुछ हमारे प्रतिकूल हो जाता है। हमें जीवन की कठिन कसौटियों से गुज़रना पड़ता है। एक नहीं, दो नहीं, कड़वे अनुभवों की झड़ी-सी लग जाती है। लगता है कि हमारे साथ कुछ भी सही नहीं हो रहा। जिस भी दिशा में जाएँ, मुसीबतें हम से पहले वहां पहुँच जाती हैं। उस समय ह्दय की गहराइयों से चीत्कार निकलती है- क्या प्रभु न्यायशील हैं? क्या वे जो कुछ करते हैं, सही करते हैं?

कुछ वर्ष पूर्व मैं एक छोटी लड़की से मिला, जो केवल बारह वर्ष की थी, वह माता-पिता के सात बच्चों में से एक थी और अपने माता-पिता के साथ सुखी एंव संतोषपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थी। उन्हें कोई अभाव नहीं था।

उस लड़की ने मुझे बताया कि उसके पिता एक नेक इंसान थे। उनका जीवन पवित्र-पावन, स्वस्थ और सुखी था। उन्हें कोई बुरी आदत नहीं थी। वे न शराब पीते थे, न सिरगेट। ऐशो-आराम की अपेक्षा, वे अपना खाली समय परिवार के साथ बिताते थे क्योंकि उन्हें वे बहुत प्यार करते थे। वे ईमानदार और मेहनती व्यक्ति थे। वे ज़्यादा काम करते ताकि परिवार के लिए अधिक धन कमा सकें।

जब वे बच्चों के साथ समय बिताते, उनसे प्रभु और पवित्र-पावन संतों के बारे में बातें करते। उन्हें पुराणों अथवा महाकाव्यों से गाथाएँ सुनाते। उन्होंने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए और नेक इंसान बनने की प्रेरणा दी।

एक रात उन्होंने छाती में दर्द की शिकायत की, इससे पहले कि डॉक्टर पहुँचे, उनके प्राण पखेरु उड़ गए।

उस लड़की ने आँखों में आँसू भरकर मुझे बताया – मेरे पिता ने हमें हमेशा यही कहा कि प्रभु जो कुछ करते हैं, वह हमारे लिए अच्छा ही होता है। छोटी से छोटी घटना जो हमारे साथ घटती है, उसमें उनका अनुग्रह रहता है। इसलिए कभी हरि इच्छा पर प्रश्न मत उठाओ। कभी यह मत पूछो कि प्रभु तुम्हारे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं?

अब उसे लग रहा था कि उन शब्दों का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रहा। उसके पिता परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे और अब उनके सात बच्चे और बच्चों की माँ पूर्ण रुप से कंगाल और बेसहारा थे। “प्रभु ने उन्हें हम से क्यों छीन लिया?” रोते-रोते उसने पूछा “उन्होंने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? क्या प्रभु को न्यायशील कह सकते हैं?” 

मैं एक महिला से मिला जिसका विवाह एक प्रेम करने वाले दयावान व्यक्ति से हुआ था। विवाह के बाद वे हनीमून के लिए गए। पंद्रह दिन तक वे बाहर रहे जो कि उसके जीवन का सुंदर समय था। उसका पति उससे बहुत प्रेम करता था, उसकी इतनी देख-भाल करता था कि वह भाव-विभोर हो गई। वह उसकी छोटी से छोटी इच्छा पूरी करता, उसकी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी कि जो उसने पूरी न की हो। उनका हनीमून सचमुच एक सुदर सपने का साकार होना था। 

जब वे दोनों घर लौट रहे थे तो उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई और पति की वहीं मृत्यु हो गई तथा सारे सपनों का अंत हो गया। 

उस महिला ने मुझ से कहा – यह सच है कि प्रभु ने मुझे श्रेष्ठ पति दिया पर शादी के कुल पंद्रह दिन बाद उसे मुझ से छीन लेने का क्या कारण रहा होगा? अगर उसे इतनी जल्दी परलोक सिधारना था तो मेरी शादी ही क्यों कराई? क्या प्रभु न्यायशील हैं? क्या वे सचमुच न्यायशील हैं? 

एक दंपति के विवाह के पंद्रह वर्ष हो गए थे। उन्हें संतान की बड़ी चाह थी, पर वे पंद्रह वर्ष तक तड़पते रहे। अंत में प्रभु ने उनकी प्रार्थना सुनी। पत्नी ने खुशी से भरकर पति के कान में कहा कि हमें खुशी मिलने वाली है। आप जल्द ही पिता बनने वाले हैं। 

वे धनिक परिवार से थे। दोनों शुभ घटना की आशा और उमंग से प्रतीक्षा करने लगे। पूजा एंव विशेष प्रार्थनाओं का आयोजन हुआ। सैकड़ों लोगों को निमंत्रित किया गया, दावतें हुईं, विशेष उपाहर प्राप्त हुए। दिल खोलकर दान दिए गए। वृद्धाश्रम, अनाथालय आदि में विशेष सेवा कर्म किए गए। 

जब बच्चे का जन्म हुआ, वे फूले नहीं समाए, बच्चे के नामकरण पर परिवार और मित्रों के लिए भव्य भोज का आयोजन हुआ। उसी दिन वे यथासंभव संस्थाओं में गए और विकलांगों, अभावग्रस्त एंव दुखी लोगों को विशेष उपहार, भोजन तथा फल इत्यादि बांटे। उस शुभ दिन पर लाखों रुपये खर्च किए गए। 

परन्तु कुछ ही दिनों बाद पत्नी अज्ञात रोग से चल बसी। पति महोदय उस स्थिति में सम्भलने का प्रयास कर ही रहे थे कि डॉक्टरों ने बताया, उनका बच्चा बीमार है। कुछ ही महीनों का बच्चा भयानक रोग से ग्रस्त हो गया। वह पशु की तरह रोता और चिल्लाता, रोते-रोते नीला पड़ जाता, संभाले नहीं संभलता। वह एक जंगली पशु के समान था। 

पिता अपने दुःखों में निंतात अकेला हो गया था और बार-बार स्वयं से पूछता कि प्रभु ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया? इतने वर्षों तक बिना संतान के हम कितने सुखी थे। सच है कि हमें संतान की चाह थी, पर हम उसके बिना चला लेते क्योंकि हम एक दूसरे के साथ थे और आपस में प्रेम करते थे। अब प्रभु ने मेरी पत्नी को छीन लिया है और मुझे पशु जैसे बच्चे की देख – भाल के लिए अकेला छोड़ दिया है। वे मुझसे क्या चाहते हैं? वे सोचते हैं कि मैं ये सब संभाल सकता हूँ, क्या वे न्यायशील हैं? 

क्रमशः

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