कर्म संभल कर कीजिए

कर्म संभलकर कीजिए

कर्म रूपी कड़ियों से जुड़कर मानव जीवन बनता है। 'जैसा कर्म वैसा जीवन' यह अकाट्य सत्य है। हम जो कुछ करते हैं, मानो बीज बोते हैं, जो कालांतर में उगकर फल के रूप में हमारे सामने आता है और हमारा भाग्य बन जाता है।

करते समय जो कर्म था, लौटते समय वही भाग्य बन जाता है। हम सबने यादगार शास्त्र रामायण पढ़ा है। उसके दो प्रसंग हमें कर्मगति को समझने में काफी मदद करते हैं।

पहला प्रसंग

श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न अपने बाल्यकाल में सरयू नदी के किनारे कबड्डी खेला करते थे। एक दिन जब वे खेल रहे थे, तो श्रीराम और लक्ष्मण एक तरफ थे और भरत तथा शत्रुघ्न दूसरी तरफ थे। खेलते-खेलते श्रीराम के पक्ष के सभी बच्चे जीतते गए और भरत के पक्ष के सभी बच्चे हारते गए। यह देखकर श्रीराम के पक्ष के बच्चों ने तालियां बजा-बजाकर कहना शुरू कर दिया कि ‘राम भैया जीत गए, राज भैया जीत गए…..।’ यह सुनकर श्रीराम ने कहा, जब तक भरत भैया नहीं हारे तब तक मैं कैसे जीत गया? हार-जीत का फैसला करने के लिए फिर उन्होंने स्वयं ही कहा कि मैं दौडूंगा और भरत भैया मुझे छुएंगे। यदि ये छू लेंगे तो जीत इनकी और यदि न छू पाए तो जीत मेरी। श्रीराम के पक्ष के सभी बच्चों ने कहा, भैया राम, आप तेज़ दौड़ना ताकि भरत भैया आपको छू ना पाएं, परन्तु श्रीराम तो ऐसे दौड़े जैसे उन्हें दौड़ना ही न आता हो और चार कदम चलकर भरत ने उन्हें छू दिया। जैसे ही भरत ने छुआ, श्रीराम पीछे की ओर मुड़े और ताली बजाकर हंसते हुए कहने लगे, ‘भरत भैया जीत गए, भरत भैया जीत गए…..।’ यह देख भरत की आंखों में आंसू आ गए।

इस प्रसंग में श्रीराम का भाई भरत के प्रति निस्वार्थ स्नेह, उदारता, अपनी जीत का त्याग करके भी उसे जिता देने का भाव प्रदर्शित किया गया है। इसी भाव को महसूस करके भरत की आंखें गीली हो गई। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि श्रीराम ने त्याग, प्रेम, उदारता और स्वयं हारकर दूसरे को जिताने के बीज बोए। बोए गए बीज अवश्य उगते हैं, आज नहीं तो कल। श्रीराम के बोए गए ये बीज भी समय आने पर उगे। वो समय था उनके राजतिलक का। उस समय कैकेयी ने राजा दशरथ से श्रीराम के लिए वनवास और भरत के लिए राजगद्दी का वरदान मांग लिया था। तब श्रीराम के बोए गए बीज फल में परिवर्तित होकर उन्हीं की झोली में आ गिरे अर्थात भरत ने राजगद्दी स्वीकार करने से मना कर दिया। जो भाई, उसकी जीत के लिए सदा हारता रहा, उसे आज भरत भी हारने नहीं देना चाहता। उसने मां को ठुकरा दिया, पर भाई के प्रति भ्रातृ स्नेह (भाई के प्रति प्यार) पर आंच नहीं आने दी। उसने भी श्रीराम के प्रति निस्वार्थ स्नेह, त्याग, उदारता, सत्यता, भ्रातृभक्ति की एक मिसाल कायम कर दिखाई।

यह प्रसंग हमें प्रेरणा दे रहा है कि हम जो बोएंगे वही उगेगा। त्याग बोएंगे, त्याग उगेगा; प्रेम बोएंगे, प्रेम उगेगा; सत्य बोएंगे, सत्य उगेगा; उदारता बोएंगे तो उदारता उगेगी। हमारा बोया हुआ ही हमें वापस मिलता है, इसमें जरा भी हेर-फेर नहीं हो सकता। कर्म रूपी बीज चाहे हम अकेले में बोएं, अंधेरे में बोएं या छिपकर बोएं परंतु जब वह उगता है, बढ़ता है और फलता है तब सभी को पता पड़ जाता है कि हमने क्या बोया था। यदि मेरे जीवन में दुख है तो भी मेरे ही बीजों का फल है और सुख है तो भी मेरे ही बीजों का फल है। यह हो सकता है कि बीज बचपन में बोए और फल जवानी में लगे। श्रीराम के बचपन के बोए बीज, जवानी में ही तो उनके सामने आए फल बनकर। बीज को उगने में, बढ़ने में समय लगता है, अर्थात कर्म का फल निकलने में समय लगता है। कभी कम समय लग सकता है, कभी ज्यादा भी, कितना समय लगेगा, यह कर्म की श्रेणी पर निर्भर करता है कि वह कैसा है।

दूसरा प्रसंग

रामायण में दिखाया है कि राजा दशरथ शिकार खेलते हैं। शिकार खेलना बड़ी भारी हिंसा है। इस हिंसात्मक कर्म में अनेक निर्दोष जानवर तड़पते हैं और कर्त्ता बहादुरी के किस्से गढ़ता है। इससे भी आगे, जब मारने की आदत पड़ गई, तो जानवर के साथ-साथ मानव की भी बारी आ गई। जानवर के अंदेशे में राजा दशरथ का तीर श्रवण कुमार को जा लगा। श्रवण कुमार ने तड़प-तड़प कर जान दे दी। जब कोई मरता है, तो अकेला नहीं मरता, उसकी मौत का सदमा कइयों को लगता है। श्रवण कुमार के आश्रित उसके अंधे माता-पिता भी उस सदमे के शिकार हुए और उनके प्रण पखेरू उड़ गए।

राजा दशरथ से अनजाने में हत्या हो गई। दूसरे शब्दों में राजा दशरथ ने अनजाने में तड़पाने के, हिंसा के, हत्या के बीज बो दिए। बीज चाहे जानबूझकर बोओ या अनजाने में, उगता ज़रूर है। राजा दशरथ के बोए ये बीज भी उगे पर एक अंतराल के बाद। परंतु इस समय तो महल में जाते ही उसे चार राजकुमारों की प्राप्ति हो गई। लोगों के मन में तो यही संदेश गया कि हत्या करने वालों को पुत्र प्राप्त हो जाते है, यह विधि का कैसा न्याय है? परन्तु कर्म का हिसाब व्यापारिक हिसाब जैसा नहीं है कि मैंने 50 अच्छे कर्म किए और 50 बुरे कर्म किए, तो 50 के बदले 50, हिसाब बराबर हो गया। कर्म के विधान में 50 पुण्यों का फल अलग से मिलेगा और 50 पापों का फल अलग से प्राप्त होगा। राजा दशरथ को चार पुत्र पूर्व के किन्हीं महापुण्यों के फल के रूप में प्राप्त हुए हैं और इन तीन हत्याओं के पाप का फल भविष्य में सामने आना बाकी है।

धीरे-धीरे समय आगे बढ़ा, चारों राजकुमार बड़े हुए, चार राजकुमारियों से उनका विवाह हुआ, अयोध्या में सर्वत्र आनंद ही आनंद है, परंतु एक दिन अचानक राजा दशरथ द्वारा अनजाने में बोए गए बीज फलित हो गए और उसी की झोली में आ गिरे। वो दिन था श्रीराम के राजतिलक का। रानी कैकेयी ने जैसे ही वर के रूप में श्रीराम का वनवास मांगा, राजा दशरथ तड़पे वैसे ही जैसे श्रवण कुमार तड़पा था। तड़प बोई थी, तड़प उग आई। कष्ट बोया था, कष्ट उग आया। हत्या बोई थी, हत्या उग आई। तड़प-तड़प कर प्राण त्यागने पड़े। एक श्रवण कुमार के साथ जैसे माता-पिता दोनों सदमे में चल बसे ऐसे ही वनवास तो केवल श्रीराम को मिला था, परंतु श्री सीता जी और लक्ष्मण जी भी महाराज की आंखों से ओझल हो गए। वे भी श्रीराम के साथ वनवासी बन गए। इस प्रकार जो बीज बोए, जैसे बीज बोए, जितने बीज बोए उतने ही, उसी प्रकार से उग आए और वे झेलने पड़े। कर्म के विधान में यह भी सत्य है कि कर्म अपने कर्त्ता को पहचानकर उसी को फल की अनुभूति देता है। कर्म के फल को बांटा नहीं जा सकता। स्वयं ही स्वीकार करना पड़ता है। कोई दूसरा चाहकर भी कर्मों का बोझ हल्का नहीं करवा सकता। नजदीकी संबंधी भी नहीं। राजा दशरथ के चार पुत्र, चार पुत्र वधुएं, तीन रानियां तथा मंत्रीगण, सभासद और अनेक नौकर-चाकर होते हुए भी अपने कर्म का फल उन्हें अकेले झेलना पड़ा। कोई उनकी तड़प बांट नहीं सका, मिटा नहीं सका, कम नहीं कर सका। यहां तक कि श्रीराम भी, जिन्हें अवतार का दर्जा दिया गया, जो अहिल्या को श्राप से मुक्त कर सके परंतु अपने पिता को कर्मफल भोगने से बचा नहीं सके। इसलिए रामायण कहती है,

कर्म प्रधान विश्व करि राखा।

जो जस करई सो तस फल चाखा।

भावार्थ है कि संसार कर्म प्रधान है, जो जैसा करेगा, वैसा ही पाएगा। किसी ने सत्य कहा है, कर्म से डरो, भगवान से नहीं। भगवान माफ कर देगा, कर्म नहीं। वह तो निश्चित फल लेकर ही लौटेगा।

कुछ लोग कहते हैं कि कैकेयी दोषी थी। परंतु कैकेयी तो केवल निमित्त बनी। असली दोषी तो राजा का वो हिंसा का कर्म था। यदि राजा वो कर्म न करता, श्रापित न होता तो कैकेयी भी निमित्त न बनती। हमारे कर्म के भुगतान के लिए कोई न कोई निमित्त ज़रूर बनता है। जैसे हमने सेठ से उधार लिया। एक दिन उसका नौकर उधार चुक्ता कराने आ गया। हमारा अहंकार जाग गया कि तुम कौन होते हो हमसे उधार चुक्ता करने के लिए कहने वाले, परंतु यह नौकर तो निमित्त है। यदि हमने उधार लिया ही न होता तो यह नौकर क्यों आता? हम अपने कर्म को भूल जाते हैं और उसके कड़वे फल को देख क्रोधित या दुखी हो जाते हैं। इससे कर्म की गुत्थी और अधिक उलझ जाती है। न्यायालय में सिपाही हथकड़ी डालता है, न्यायाधीश सजा सुनाता है, परंतु ये दोनों दोषी नहीं हैं, दोषी है अपराधी का अपराध। यदि उसने वो अपराध न किया होता, तो कोई क्यों हथकड़ी लगाए और कोई क्यों सजा सुनाए? अतः हम कर्म रूपी बीज पर ध्यान दें। फल तो जैसा बीज होगा, वैसा निकलेगा ही।

कर्म के तीन स्तर हैं; मनसा, वाचा, कर्मणा। मनसा अर्थात सोचना, वाचा अर्थात बोलना और कर्मणा अर्थात शरीर द्वारा कर्म करना।

मनसा

हम जिसके प्रति जैसा सोचेंगे, वह व्यक्ति भी हमारे प्रति वैसा ही सोचेगा। कहा गया है, विचार भी यात्रा करते हैं। जैसे फोन के नम्बर दबाने पर हजारों मील दूर व्यक्ति के फोन में घंटी बज जाती है। यह इलेक्टो मैग्नेटिक वेव के माध्यम से होता है। इसी प्रकार, हमारे मन में उठे विचार से हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति के विचार प्रभावित हो सकते हैं। विचार एक सेकंड में कहीं से कहीं पहुंचकर अपना प्रभाव डाल सकते हैं। अच्छे विचारों का प्रभाव अच्छा और बुरे विचारों का प्रभाव बुरा होता है। विचारों के प्रभाव से जुड़ी एक सुंजर घटना का जिक्र करना प्रसंगिक होगा, एक गांव में एक बुढ़िया अपने खेत में रूई उगाती थी और बैलगाड़ी में भरकर शहर में एक सेठ के यहां बेचने जाती थी। एक दिन बुढ़िया के मन में विचार आया, इतने दिन से रूई बेच रही हूं, कुछ ज्यादा आमदनी नहीं हो रही है, आज गाड़ी में भरी रूई के बीच वाले हिस्से में एक किलो पानी डाल देती हूं, इससे वजन बढ़ जाएगा और पैसा ज्यादा मिलेगा। बुढ़िया ने वैसा ही किया और रूई लेकर सेठ जी की दुकान के सामने पहुंच गई। जैसे ही सेठ जी ने उसे देखा, उसके मन में विचार आया, इतने दिनों से इसकी रूई खरीद रहा हूं, बचत कुछ ज्यादा नहीं होती है, आज तुला की सूत की डोरी थोड़ी चढ़ा लेता हूं। उसने ऐसा ही किया। इससे रूई वाला पलड़ा हल्का हो गया और वजन उतना ही निकला जितना हमेशा निकलता था, परिणामस्वरूप बुढ़िया को पैसे भी उतने ही मिले जितने हमेशा मिलते थे। प्रश्न यह है कि सेठ जी के मन में अचानक डोरी चढ़ाने का विचार कहां से आया?

वास्तव में जब हम किसी के बारे में कुछ भी सोचते हैं, तो हमारे विचारों के प्रकम्पन (सूक्ष्म प्रभाव) उस व्यक्ति की दिशा में जाकर उसके विचारों को प्रभावित करते हैं, जिसका पता उसे भी नहीं पड़ता कि यह प्रभाव कहां से आ रहा है, परंतु उसके विचार प्रभावित अवश्य होते हैं। बुढ़िया ने जब सोचा कि मैं सेठ के साथ ऐसा करूंगी तब उस सोच के प्रकम्पनों ने सेठ जी के विचारों को भी उन्हीं भावों (ठगी के भावों) से प्रकम्पित कर दिया। हम यह ना सोचें कि मैंने किसी को कुछ बताया नहीं तो सामने वाले को क्या पता पड़ेगा, हमारे विचारों के सूक्ष्म प्रभाव बिना बोले भी सब कुछ सुझा देते हैं। अतः विचार रूप में भी ठगी, बेईमानी, धोखा, विकृतियां बोएंगे तो यही उगेंगी और हमें वह उगा हुआ फल स्वीकार करना पड़ेगा।

भगवान कहते हैं, भावना का फल अवश्य मिलता है। आप सबकी श्रेष्ठ भावना है, स्वार्थ रहित भावना है, रहम की भावना है, कल्याण की भावना है। ऐसी भावना का फल नहीं मिले, यह हो नहीं सकता। जब बीज शक्तिशाली हो, तो फल ज़रूर मिलता है। सिर्फ इस श्रेष्ठ भावना के बीज को सदा स्मृति का पानी देते रहो, तो समर्थ फल, प्रत्यक्ष फल के रूप में अवश्य प्राप्त होता ही है। क्वेश्चन नहीं, होगा या नहीं होगा। सदा समर्थ स्मृति का पानी है अर्थात सर्व आत्माओं के प्रति शुभ भावना है, तो विश्व शांति का प्रत्यक्ष फल मिलना ही है। सर्व आत्माओं की जन्म-जन्म की आस बाप के साथ-साथ सभी बच्चे भी पूर्ण कर रहे हो और सर्व की हो जानी है।

वाचा

हम जो बोलते हैं, वह भी कर्म है और उसका फल भी बीज के अनुरूप ही निकलता है। इसलिए कहा गया है,

शब्द सम्भल के बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव।

एक शब्द बने औषधि और एक शब्द करे घाव।।

मान लीजिए, हजारों की सभा में हमने एक शब्द उछाला कि ‘आप सभी बहुत अच्छे हैं’, तो हमारे इस एक बीज के हजारों फल बनकर हमारे पास वापस लौटेंगे। सामने बैठे सभी कहेंगे, ‘आप भी बहुत अच्छे हैं।’ हमारा दिया हुआ ही हमारे पास वापस आ गया। हम जो बोलेंगे, प्रतिध्वनित होकर वही लौट आएगा। आज हमारे पास जो कुछ है वह हमारा दिया हुआ ही लौटा है, चाहे वह अच्छा है या बुरा है। एक बार एक विद्यालय में एक कक्षा में बच्चे बहुत शोर मचा रहे थे। शिक्षक कक्षा में गया और क्रोध में आकर बच्चों को कहा, ‘क्यों क्लास रूम को बूचड़खाना बना रखा है?’ शिक्षक ने क्रोध में जो शब्द रूपी बीज बोया वह हजारों फल लेकर उसी के पास लौट आया। कक्षा में बैठे सभी बच्चों ने मिलकर उस शिक्षक का नाम बूचड़ रख दिया। अब वो जिधर भी जाता है, उसके कानों में शब्द आता है, बूचड़ जा रहा है, बूचड़ जा रहा है। केवल उस कक्षा तक सीमित न रहकर यह शब्द स्कूल के बच्चे-बच्चे तक फैल गया। हम बाजरे के एक दाने से हजारों दाने पाते हैं, मकई के एक दाने से भी हजारों दाने पाते हैं, इसी प्रकार, एक नकारात्मक शब्द बोया, तो बिल्कुल वैसे ही हजारों नकारात्मक शब्द उग आए। जो बोएंगे वही उगेगा। अपशब्द बोएंगे, तो अपशब्द ही उगेंगे। शुद्ध शब्द बोएंगे, तो वही सुनने को मिलेंगे।

कर्मणा

शरीर और इसकी इन्द्रियों द्वारा किए जाने वाले कर्मों को कर्मणा कर्म कहा जाता है। लेख के प्रारंभ में रामायण के दो प्रसंगों के माध्यम से हम कर्मणा कर्मों को काफी समझ चुके हैं। एक राजस्थानी कहानी से इसका स्पष्टीकरण और अच्छे से हो जाएगा। पुराने जमाने की बात है, एक गरीब ठठेरा तीर्थ यात्रा के लिए गया और अपनी जीवनभर की कमाई, गांव के ठाकुर के पास रख गया। कई तार्थों की यात्रा करके वह 6 माह बाद लौटा और ठाकुर जी से अपना धन मांगा। ठाकुर जी देने से मुकर गए। जब इस गरीब ने रोना-चिल्लाना शुरू किया, तो ठाकुर जी ने अपने आदमियों को बुलाकर इसे धक्के मारकर निकालने का आदेश दे दिया। जब आदमी इसे पकड़कर ले जाने लगे, तो ठाकुर जी की दहलीज पर, यह कहते हुए ठठेरे के प्राण निकल गए कि यह धन तो मैं लेकर ही रहूंगा। ठाकुर जी ने अंतिम संस्कार करवा दिया और सोचा, बला टली। 6 मास बाद ठाकुर जी को पोता जन्मा पर जन्म से बीमार। उसके इलाज में पानी की तरह पैसा बहने लगा। बालक जब 8 साल का हुआ, तो यह कहकर संसार से विदा हो गया कि ठठेरे के रूप में मैंने जो धन आपको दिया था, वह मैंने अपने शरीर पर लगवा लिया। अब आप पर मेरा कोई कर्ज नहीं बचा इसलिए मैं जा रहा हूं। कहानी हमें बता रही है कि धोखे, झूठ, ठगी से प्राप्त धन बीमारी में लगकर समाप्त हो गया। ऐसा धन आंधी की गति से आकर तूफान की गति से चला जाता है। बरकत केवल ईमानदारी से कमाए धन से ही होती है।

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