ऐसी शिवरात्रि अबकी बार

एक बार एक शहर में 10 और 12 साल के दो बच्चे, मेरे द्वारा प्रसाद वितरण करते समय पंक्ति में थे। जैसे ही वे एकदम सामने आए, उन्होंने जेब में हाथ डाला, बड़ा-सा जेंट्स पर्स बाहर निकाला और दोनों ने 50-50 रुपए मेरे सामने रखी थाली में रख दिए। फिर कह उठे, दीदी जी, भगवान शिव को धन अर्पित किए बिना हम कभी भी उनका प्रसाद नहीं लेते हैं।

यह देख मेरे मन में विचार आया (विचार तो सेकेंड में आ जाता है) कि इन नाबालिग बच्चों के पास इतना बड़ा पर्स! धन दान करने का इतना उत्साह! ये तो विद्यार्थी हैं, इनके पास पैसे कहां से आए? पंक्ति में बच्चों से आगे वाले और पीछे वाले लोग मीठा-मीठा मुस्करा रहे थे। मुझे गंभीर देखकर एक भाई ने मेरे कान के पास आकर धीरे से कहा, बहन जी, ये नकली नोट हैं। यह सुनकर मुझे हंसी आ गई। बाकी सब तो हंस ही रहे थे। इस प्रकार, बच्चों की इस नादानी ने पूरे सभागार के माहौल को हंसी-खुशी और ठहाकों में तब्दील कर दिया।

बच्चे तो प्रसाद लेकर चले गए पर मेरे मन में विचार उठा कि दान देना महत्वपूर्ण है, परंतु उससे भी ज्यादा महत्त्व रखता है, देने का संस्कार बनना। दान की वस्तु छोटी हो या बड़ी, असली हो या नकली परंतु देने वाले में दाता-पन के संस्कार पैदा करती है। आज इन बच्चों ने नकली चढ़ावा चढ़ाकर, अपने में भगवान शिव पर कुछ अर्पित करने का संस्कार बनाया। यही संस्कार आने वाले समय में इनसे असली चढ़ावा भी चढ़वाएगा।

असली छोड़, नकली चढ़ाने की नादानी

अब शिवरात्रि आ रही है। भगवान शिव के हम सब भगत, उनके मंदिरों में जाएंगे और हर साल की भांति बेर, अक, धतूरा, भांग, कच्चा दूध मिला पानी आदि-आदि उनको अर्पित करेंगे। सोचने की बात यह है कि भगवान शिव इन चीज़ों का क्या करेंगे? उनके ये किस काम आएंगी? कहीं हम भी उन बच्चों की तरह नादानी तो नहीं कर रहे? असली चढ़ावे को छोड़कर कहीं नकली चीज़ें तो नहीं चढ़ा रहे? जैसे नकली चीज़ केवल खेल के लिए, मन बहलाने के लिए, हंसने-हंसाने के लिए हो सकती है, पर उससे असली मकसद पूरा नहीं हो सकता। जैसे नकली नोटों से हम सामान नहीं खरीद सकते, नकली फलों से हम पेट नहीं भर सकते, नकली बस में बैठकर हम दूसरे शहर नहीं जा सकते, नकली गुड़ियों से अपनी ममता को तृप्त नहीं कर सकते, इसी प्रकार नकली या बनावटी चढ़ावे से असली फल (परिणाम) भी प्राप्त नहीं कर सकते।

काल-कंटक बढ़ोतरी पर क्यों?

भगवान शिव से हम कहते हैं, भर दो झोली, बिगड़ी बना दो। फिर कहते हैं, शिव के भंडारे भरपूर, काल-कंटक सब दूर। परंतु यह महिमा हमारे गायन तक ही रह गई, असल में तो इतनी शिवरात्रियां मनाते भी हमारे तन, मन की झोली खाली (शक्तिहीन, बीमार, तनावग्रस्त, अवसादग्रस्त, चिंतित, नकारात्मक) है। हमें लगता है कि किस्मत हमारी बिगड़ी हुई है और काल-कंटक बढ़ोतरी पर हैं व भंडारे भरने की बजाए खाली होते जा रहे हैं, ऐसा क्यों?

कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे नकली चीज़, मात्र देखने भर का सुख देती है, असली नहीं; उसी प्रकार, यह महिमा भी मात्र गाने, गुनगुनाने और स्मरण करने भर का सुख देती है, असली नहीं; हमारे जीवन व्यवहार में यह उतरती ही नहीं?

फिर नकली चीज़ में मानव का श्रम और धन भी तो नहीं लगता। किसी को असली गाय दान में देनी हो तो मानसिक ऊर्जा, धन, श्रम कितना खर्च होगा! यदि मिट्टी की गाय दान करें, तो कितना खर्च होगा, यह हम सभी भली-भांति जानते हैं। असली गाय दान करने के बदले में क्या मिलेगा और मिट्टी वाली के बदले क्या मिलेगा, यह भी हम अच्छी तरह से जानते हैं।

बेर चढ़ाएं पर वैर भी अवश्य चढ़ाएं

तो आइए देखें, भगवान शिव हमसे क्या चाहते हैं? भगवान की महिमा में गाया जाता है, वे निर्भय और निर्वैर हैं। वे अपने बच्चों को भी अपने समान ही देखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मेरा हर भक्त, हर बच्चा अपने मन का भय और वैर मुझे अर्पण करे। मन में भय भी तब आता है जब किसी से वैर-विरोध हो। इस वैर-शत्रुता के चलते हम कई मनुष्यों से दूरी बना लेते हैं और परिणाम स्वरूप उनसे होने वाले फायदों से भी वंचित हो जाते हैं। हम मन में गांठ, तो लगा लेते हैं पर उसे खोलते नहीं हैं। जैसे शरीर में गांठ कभी-कभी भयानक कैंसर का रूप धारण कर लेती है, ऐसे ही मन की गांठ रिश्तों का कैंसर बन जाती है। एक बार एक बहन (मान लो ए) के दो पुत्र थे, दूसरी मान लो बी की दो पुत्रियां। ए को घमंड रहता था कि मेरे तो पुत्र हैं, इसलिए वह बी को नीचा दिखाने का सूक्ष्म भाव मन में रखती थी। धीरे-धीरे यह सूक्ष्म भाव और इसके साथ जुड़े अन्य नकारात्मक भाव गहरे होते गए और दोनों में बोल-चाल बंद हो गई। कालांतर में बी की दोनों पुत्रियां पढ़-लिखकर अच्छे पदों पर सेवारत हो गई। ए के दोनों पुत्र पढ़े भी कम और नौकरी के लिए मारे-मारे फिरते रहे। कई लोगों ने ए से कहा, तुम बी को कहो ना, उसकी पुत्रियां इतने बड़े पदों पर हैं, तुम्हारे पुत्रों को मदद करें परंतु वह कहे कैसे? संसार में कभी भी, किसी का भी पासा पलट सकता है इसलिए प्यार, स्नेह, सम्मान बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। विचार कीजिए, इतने वर्षों में कितनी शिवरात्रियां आई, ए और बी हर बार शिवलिंग पर बेर तो चढ़ा आई परन्तु मन के वैर, विरोध और शत्रुता को नहीं चढ़ाया। बेर चढ़ाकर अल्पकालिक खुशी तो मिली पर यदि वैर चढ़ जाता तो सदाकाल की खुशी मिलती।

इसी प्रकार भगवान शिव कहते हैं, आप मेरे मीठे बच्चे हो। जीवन में मिठास का बहुत महत्व है। किसी भी शुभ अवसर पर एक-दो का मुख मीठा कराया जाता है। प्रसाद में भी मीठी चीज़ दी जाती है। फल भी वही पसंद आता है, जो मीठा हो। पक्षी भी वही मन को भाता है, जो मीठा बोले। इसी प्रकार मानव भी तभी अच्छा लगता है, जब उसके शब्द मीठे और मन को राहत देने वाले हों।

भगवान ने मांगी थी कड़वी जबान

कहा जाता है कि शोधकर्त्ताओं ने जब कड़वाहट की खोज करनी शुरू की, तो संसार की सबसे कड़वी चीज़ मिली ‘मानव की जुबान’। यूं तो कई जानवर बड़े जहरीले, हिंसक और आक्रामक होते हैं। बिच्छू, जहरीला डंक मारता है, सांप के दांत में विष होता है, मच्छर काटकर बीमार कर देता है, शेर आदि हिंसक प्राणी मारकर खा जाते हैं, हाथी पांव से कुचल देता है, परंतु इनकी वाणी कभी प्रहार नहीं करती। ये शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं पर मन तक इनकी पहुंच नहीं है। प्रकृति में भी कई कड़वी चीज़ें हैं। उन्हें खाकर आदमी मर भी सकता है, परंतु ये भी शरीर को ही नुकसान पहुंचाती हैं, मन को नहीं। मानसिक आघात, शारीरिक आघात से कई गुणा गहरे, घातक और लंबे काल तक चलने वाले होते हैं। इतनी जहरीली और कड़वी चीज़ें संसार में होते हुए भी जबान को सबसे अधिक कड़वा इसलिए कहा गया क्योंकि यह मर्म को अर्थात मन को आहात करती है। मानव को अंदर ही अंदर सुलगा देती है। उसका बदला लेने के लिए यह सुलगती आग एक दिन ज्वाला रूप धारण कर सबकुछ राख कर देती है। मन से आहात व्यक्ति अधमरे जैसा होता है। उसका शरीर गति करता दिखाता है, परंतु मन घायल की तरह तड़पता रहता है। तो भगवान ने कहा था, बच्चे, इस कड़वी जबान को, कटु दुष्टि को मुझ पर अर्पण करना, मैं भंडारे भरपूर कर दूंगा।

नकली चीज़ के बदले असली वरदान कैसे मिलेगा?

हम जानते हैं, जबान कड़वी तब होती है जब पहले मन कड़वा होता है। मन कड़वा तब होता है, जब अहंकार, मैं-पन और देह-अभिमान आता है। ये सभी भंडारे खाली करने वाले हैं। जब से ये आए मानव मन में, भारत के सोने-हीरे के मटके खाली हो गए। चीज़ें महंगी हो गई, मानव सस्ते हो गए। क्यों? देखिए, कोई कहे, हमारी गाय एक दिन रख लो। व्यक्ति रख लेगा। सोचेगा, मीठा दूध पीऊंगा परंतु किसी के व्यक्ति को रखने से डरेगा। सोचेगा, पता नहीं कैसा हो? क्या कर दे? चोरी करले, धोखा कर ले। तो गुणों की कमी के कारण मानव की कीमत कम हो जाती है। इसलिए भगवान ने कहा कि तुम विकारों की कड़वाहट मेरे पर चढ़ा दो, तो मैं तुम्हें हीरे जैसा बना दूंगा और भंडारे भरपूर कर दूंगा। यहां भी हमने उन बच्चों की तरह नकली चीज़ खोजने की नादानी की। वह मिली कड़वे अंक के रूप में। उसे चढ़ा दिया। अब नकली चीज़ के बदले असली वरदान कैसे मिलेगा? इसलिए ना हमारे सुख-शांति के भंडारे भरे और ना ही धन-दौलत के।

सांसारिक प्रप्तियों के नशे का त्याग

और देखिए, हम भगवान पर भांग चढ़ाते हैं, धतूरे के फूल चढ़ाते हैं, गांजा चढ़ाते हैं। भगवान ने कहा था, नशा (अहंकार) रखना नहीं। हमने समझा कि भगवान नशीली चीज़ें मांग रहे हैं और चुन-चुन कर नशे वाली चीज़ें उन्हें अर्पित की। परंतु क्या हम जानते हैं, सबसे ज्यादा नशीली चीज़ें कौन-सी हैं। किसी कवि ने लिखा है,

कनक कनक ते सौगुणा मादकता बिखराए।

एक खाए बौराय, एक देखे बौराए।।

यहां कनक शब्द के दो अर्थ हैं। एक अर्थ है धतूरा और दूसरा अर्थ है सोना। कवि कहता है कि धतूरे से ज्यादा नशा सोने में है। धतूरा खाने से नशा चढ़ता है, परंतु सोने को तो देखने मात्र से ही नशा चढ़ जाता है। इस संसार में हरेक मानव को अपना-अपना नशा है। पुत्र को नशा है कि मैं बहुत कमाता हूं, मेरे पिता ने तो ढंग से घर भी नहीं बनाया पर मैंने कोठी खड़ी कर ली। पुत्रवधू को नशा है कि मैं बड़े बाप की बेटी हूं। चार भाइयों की बहन हूं, बहुत दहेज लाई हूं, बहुत सुंदर हू। बुढ़िया को नशा है कि मैं चार पुत्रों की मां हूं। बुजुर्ग को नशा है कि मैं इलाके का नम्बरदार हूं और 20 एकड़ जमीन का मालिक हूं। घर में सभी अपने-अपने नशे में झूमते रहते हैं और एक-दूसरे से टकराते रहते हैं। भगवान ने कहा था, किसी भी सांसारिक चीज़ का नशा मत रखना। ये सब चीज़ें अल्पकाल की हैं, प्रकृति और ईश्वर की अमानत हैं। इन्हें निमित्त भाव से और नम्रता से प्रयोग करना परंतु हम ठहरे नादान बच्चे। बच्चों के नकली नोटों की तरह हमने भी अंदर के नशों को छिपाए रखा और बाहरी नशीली चीज़ें भगवान पर चढ़ा दी। इन नकली चढ़ावों से अल्पकाल का मनोरंजन तो हुआ पर सदाकाल का रंजन नहीं हुआ। घर की सुख-शांति के भंडारे भरपूर नहीं हो पाए।

परंतु ऐसा नहीं है कि नकली चढ़ावा चढ़ाने वाले भक्तों से भोलेनाथ शिव को प्रेम नहीं है। वे प्रेम के सागर अपने भक्तों पर खूब प्रेम लुटाते हैं। उनकी नादानी से भी उनको स्नेह है। इसलिए वे नकली चढ़ावा भी इस शुभभावना के साथ स्वीकार करते हैं कि इन्हें चढ़ाने की आदत तो पड़ी। आने वाले समय में ये असली चढ़ावा अर्थात तन, मन, धन भी अवश्य अर्पण करेंगे।

जानिए अनहद नाद को

जैसे पहली कक्षा के छोटे बच्चे जब पढ़ते हैं, तो आवाज़ करते हैं, परंतु बड़े बच्चे, एकांत में मौन में पढ़ाई करते हैं। भक्ति है पहली क्लास। इसमें भक्त उच्च स्वर में गीत-संगीत, भजन, मंत्रोच्चारण आदि करते हैं, परंतु ज्ञान मार्ग में आते ही उनकी साधना मन के जाप वाली हो जाती है। तो हे शिव भक्तों, आप इतने वर्षों से शिवरात्रि का जागरण, पहली क्लास के बच्चों जैसे उच्च स्वर से कर रहे हैं। अब अगली कक्षा में जाएं। वाणी से परे, निवार्ण का आनंद लेना सीखिए। अनहद नाद और मनमनाभव का मंत्र जानिए।

नयापन हरेक को पसंद आता है, तो शिवरात्रि मनाने में भी नयापन लाइए। नया कीजिए, नया पाइए। कहा गया है, आप पुराना ही करेंगे तो पुराना ही पाते रहेंगे। नया करेंगे तो नया पाएंगे। तो सबसे पहला नयापन अपने चढ़ावे में लाइए। गुड़ियों की पूजा की तरह बनावटी चीज़ें न चढ़ाकर अपनी बुराइयों की बलि चढ़ाइए। ऐसी शिवरात्रि इस बार मनाइए।