वह दिव्यात्मा

वह दिव्यात्मा

वे हंसे…उनकी हंसी में सुंदर गुलाबों की महक थी, जो हमारे बगीचों से कहीं अधिक सुवासित थी।

मैं एक छोटे से गांँव के हरे-भरे खेतों की पगडंडियों पर मंत्रमुग्ध होकर चला जा रहा था। तभी मुझे दूर से एक मानव-आकृति दिखाई दी। उसके लंबे क़द और छरहरी काया ने मुझे कुछ ऐसा आकर्षित किया कि मैं चुंबक की तरह उनकी ओर खींचा चला गया। जिस तरह सरोवर में खिले हुए कमल–पराग की तरफ, भौंरा आकर्षित हो जाता है, उसी तरह मैं भी अपनी सुध-बुध खो चुका था।

राह की धूल से उनके कपड़े और शरीर मटमैले हो गए थे। घुटनों तक पहनी हुई धोती पर गीली मिट्टी के दाग़ लगे थे। उनका फटा पुराना कुर्ता उनकी विपन्नता की कथा स्वयं कह रहा था। परंतु उस श्रीहीन से लगने वाले व्यक्ति की चाल में सम्राट के जैसी गरिमा थी। उनकी शानदार गति उनके अंतर के अधिपति की अभिव्यक्ति थी।

मैं करीब-करीब भागता हुआ, उनके पास पहुंँचा। उनके ओजपूर्ण और सौम्य चेहरे से जो स्नेह  टपक रहा था, वह मानों गहरी अंधेरी रात में जलती हुई शमा की लौ की तरह था। मैं खुशी से सिहर उठा।

मैंने उस दिव्यमूर्ति से पूछा:– आप कौन हैं?

उन्होंने कहा:– मैं तो सत्य और प्रेमनगर की यात्रा पर निकला एक मुसाफिर हूँ

मैंने पूछा:– आपका नाम क्या है? उन्होंने कहा:– यहाँ सारे पर्वतवासी मेरी इस देह को…मस्ताना या दीवाना कहकर पुकारते हैं, तुम भी इसी नाम से मुझे पुकार लो।

मैं बोला:– आप मस्ताना नहीं, मस्तानों के सम्राट हैं। आप तो ईश्वर प्रेम में  दीवाने हुए हैं। आपकी आँखों में उसी ईश्वर की ज्योति चमक रही है, आपके अस्तित्व से वही दिव्य संगीत सुनाई दे रहा है। आप दीवाने नहीं…मालिक हैं, स्वामी हैं।

वे हंसे…उनकी हंसी में सुंदर गुलाबों की महक थी, जो हमारे बगीचों से कहीं अधिक सुवासित थी।

मैंने उनसे उनके साथ चलने की अनुमति माँगी। वे बोले– यह धरती तो उस भगवान की है। वहीं इसके मालिक हैं। उस शाश्वत परमात्मा की धरती पर विचरण करने का अधिकार सभी प्राणियों को है।

मैं उनके प्रति आदर और प्रशंसा के भाव लिए, उसके साथ-साथ चल पड़ा। मैंने देखा…वे एक-एक कदम बड़े ध्यान से रख रहे थे, ताकि कहीं कोई कीड़ा या जीव उनके पैरो तले कुचल न जाए। वे नीचे झुक कर भी उन्हें राह‌ से परे कर रहे थे।

अचानक हमें एक आदमी मिला, उसने एक टोकरे में कई पंछी बाँध रखे थे। महापुरुष ने उससे पूछा – मेरे प्यारे भाई! तुम इन ईश्वर के नन्हे मुन्ने बच्चों को बाँध कर कहां ले जा रहे हो?

उस बहेलिए ने कहा– आज पूरा दिन जाल बिछा कर बैठा था, बहुत इंतजार के बाद ही ये कुछ पंछी पकड़ पाया हूँ । इन्हें बाजार में बेचने जा रहा हूँ, ताकि अपने बच्चों के लिए भोजन का प्रबंध कर सकूँ।

उन्होंने पूछा– मेरे भाई…क्या तुम थोड़ी देर ठहर कर मुझे इन पंछियों को देखने दोगे?

बहेलिए ने वह टोकरा… उस भद्र पुरुष के चरणों में रख दिया। वे बहुत देर तक, बड़े आत्मीय स्नेह से, उन पंछियों को ध्यान से देखने लगे। उनमें से आधे तो मौत के डर से निष्प्राण हो चुके थे।

यह देखकर महापुरुष की आँखें भर आईं और वे बड़े कातर स्वर में उन पंछियों से बोले– हे भगवान के प्यारे बच्चों…भाग्य अभी भी तुम्हारे पक्ष में नहीं है। ये अज्ञानी और पशु प्रवृत्ति के लोग, तुम्हें पकड़ कर, उन क्रूर लोगों के हाथ बेच देते हैं, जो तुम्हें मार कर अपना आहार बनाते हैं। मेरे प्यारे भाई-बहनो में तुम्हें आश्वासन देता हूं कि…शायद आने वाले कल में ऐसा नहीं होगा। इन सबको सद्बुद्धि प्राप्त होगी और फिर ये सभी तुम्हें अपना ही सहोदर समझेंगे। तुम्हें अपना भाई-बहन मानने लगेंगे। इनके अंदर भी यह भावना जागेगी कि  तुम भी उसी परमात्मा के विशाल परिवार के सदस्य हो, जिसका दूसरा नाम है प्रेम और करुणा।

ह्रदय को चीर देने वाली इस वेदना भरी  करुण पुकार  से उस बहेलिए का दिल भी  पसीज गया। उसने उस महापुरुष के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा – हे  ईश्वर के अनोखे आराधक। मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं? परंतु मेरे बेचैन ह्रदय को तब तक चैन नहीं आएगा , जब  तक कि मैं इन पंछियों को आपकी शरण में समर्पित न कर दूँ। अब ये सभी पंछी आपके हैं, आप इनके साथ जो चाहें वह करें और मुझे आशीष देकर जाने की आज्ञा दें।

महापुरुष ने उस टोकरे को इस तरह स्वीकार किया, मानो वो एक बेशकीमती ताज हो। उन्होंने उसमें से हर एक पंछी को निकाला, स्नेह से थपथपाया और प्यार भरे शब्दों से अलविदा कह कर खुले आसमान में उड़ा दिया। मुक्त गगन में पंछी गाते हुए उड़ने लगे।

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