अभिभूत होना

अभिभूत होना

अक्सर एक भाव मेरे हृदय और मेरे पूरे अंतरात्म को घेर लेता है। वह गहन प्रेम में होता है और भय, संताप, दुख, असहायता और अवसाद में भी होता है।

सभी विभिन्न आवेगों में निश्चित ही बहुत समानता है: वह है भावावेशित हो जाना। यह चाहे प्रेम हो, चाहे यह घृणा हो, चाहे यह क्रोध हो; यह कुछ भी हो सकता है। यदि यह बहुत अधिक हो जाए, तो यह उससे भावावेशित हो जाने की अनुभूति देता है। यहां तक कि दर्द और तकलीफ भी वही अनुभव (Anubhav) पैदा करते हैं।

यह विशेष रूप से एक भावावेशित व्यक्तित्व का सूचक है। जब यह क्रोध है, तब यह पूरी तरह क्रोध है। जब यह प्रेम है, यह पूरी तरह प्रेम है। यह पूर्ण रूप से, अंधे की तरह उस भाव में डूब जाता है। इसके परिणामस्वरूप जो भी कृत्य होता है, वह गलत होता है। यहां तक कि यदि भावावेशित प्रेम भी हो, तो जो कृत्य इससे निकलता है वह ठीक नहीं होगा।इसके मूल की तरफ जाएं, जब भी तुम किसी भाव से आवेशित होते हो, तुम सभी तर्क खो देते हो, तुम सभी ग्राहकता, अपना हृदय खो देते हो।

यह लगभग एक काले बादल की तरह होता है, जिसमें तुम खो जाते हो। तब तुम जो भी करते हो वह गलत होने वाला है।

प्रेम तुम्हारे भावावेश का हिस्सा नहीं होना चाहिए। साधारणतया लोग यही सोचते और अनुभव (Anubhav) करते हैं, परंतु जो कुछ भी भावावेशित है, बहुत अस्थिर है। यह एक हवा के झोंके की तरह आता है और गुजर जाता है और पीछे तुम्हें रिक्त, बिखरा हुआ, दुख और पीड़ा में छोड़ जाता है।

जिन्होंने आदमी के पूरे अस्तित्व को, उसके मन को, उसके हृदय को, उसके बीइंग को जाना है, उनके अनुसार, प्रेम तुम्हारे अंतरात्मा की अभिव्यक्ति होनी चाहिए न कि एक भावावेश।

भाव बहुत नाजुक, बहुत परिवर्तनशील होता है। एक क्षण को लगता है कि यही सब कुछ है, दूसरे क्षण तुम पूरे रिक्त होते हो।

इसलिए पहली चीज जो करनी है वह यह कि प्रेम (Prem) को इस आवेशित भावावेश की भीड़ से बाहर कर लेना है। प्रेम भावावेश नहीं है।

इसके विपरीत प्रेम एक गहरी अंतर्दृष्टि, स्पष्टता, संवेदनशीलता और जागरूकता है।

परंतु इस तरह का प्रेम शायद ही कभी उपलब्ध होता है, क्योंकि कभी कभी ही कोई व्यक्ति अपनी निजता तक पहुंचता है।

कुछ लोग हैं जो अपनी कार को प्रेम करते हैं… वह प्रेम मन का प्रेम है। तब तुम अपनी पत्नी को, अपने पति को, अपने बच्चे को प्रेम करते हो… वह प्रेम हृदय का प्रेम है। परंतु उसे जीवंत बने रहने कि लिए बदलाव की आवश्यकता है और चूंकि तुम उसे उसकी परिवर्तनशीलता की अनुमति नहीं देते, वह जड़वत हो जाती है। प्रतिदिन वही पति… यह बहुत ही उबाऊ अनुभव है। यह तुम्हारी संवेदनशीलता को कुंद कर देती है, यह आनंद की हर संभावना को क्षीण कर देता है। तुम धीरे-धीरे हंसी की भाषा भूलने लगते हो। जीवन बिना प्रसन्नता के एक काम मात्र रह जाता है। और तुम्हें काम करना पड़ता है क्योंकि तुम्हारी पत्नी है और तुम्हारे बच्चे हैं।

तुम्हें अपने प्रेम को भावात्मक जकड़न से बाहर करना होगा, जो तुम्हें तुम्हारे जन्म से मिला है और तुम्हें अपने बीइंग तक पहुंचने का मार्ग तलाशना होगा। जब तक कि तुम्हारा प्रेम तुम्हारे होने का एक हिस्सा न हो जाए, यह दुख, अवसाद और पीड़ा से भिन्न नहीं है।

ओशो, ओम शांति: शांति: शांति:, साउंडलेस साउंड, प्रवचन=17 से उद्धृत

ओशो को आंतरिक परिवर्तन यानि इनर ट्रांसफॉर्मेशन के विज्ञान में उनके योगदान के लिए काफी माना जाता है। इनके अनुसार ध्यान के जरिए मौजूदा जीवन को स्वीकार किया जा सकता है।

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