घर जाना, घर वापस जाना

घर वापस जाने का समय हो गया

अनन्या उसके बिना एक दिन भी रहने की कल्पना नहीं कर सकती थी और उसने कभी नहीं सोचा था कि उसे ऐसा करना पड़ेगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

अनन्या अपना 13वां जन्मदिन मना रही थी। पूरे मोहल्ले को उसके जन्मदिन पर बुलाया गया था। उसके स्कूल के दोस्त भी वहां पर मौजूद थे। जल्द ही केक काटने का समय आ गया। जन्मदिन के गाने की आवाज गूंज उठी। पूरी मेज़ उपहारों से भरी हुई थी। उन उपहारों में से एक उपहार अलग रखा हुआ था— वह एक मुलायम, लाल कपड़े से ढकी एक बड़ी टोकरी थी।

उसने कपड़े के नीचे से एक हल्की आवाज़ आती हुई सुनी। टोकरी के अंदर क्या था यह देखने के लिए अनन्या ने कपड़ा हटा दिया। कपड़ा हटाते ही एक भौंकने की आवाज आई! यह एक छोटा डॉगी था। अनन्या का चेहरा खिल उठा। उसने कभी नहीं सोचा था कि इतने साल के बाद आज उसके जन्मदिन पर उसकी यह इच्छा पूरी हो जाएगी। उस दिन से अनन्या और सिम्बा हमेशा एक साथ हैं।

3 साल हवा की तरह उड़ गए और समय के साथ उनका बंधन भी मज़बूत होता चला गया। उसके घूमने से लेकर खाने तक अनन्या ने सिम्बा की हर जरूरत को पूरा करने की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। अनन्या उसके बिना एक दिन भी रहने की कल्पना नहीं कर सकती थी और उसने कभी नहीं सोचा था कि उसे उससे कभी दूर भी होना पड़ेगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

अनन्या को अपने शहर से दूर एक प्रतिष्ठित स्कूल में दाखिला मिल गया था। हालांकि यह एक गर्व की बात थी लेकिन वह जानती थी कि इसका मतलब है सिम्बा को छोड़कर जाना। उसने सिम्बा को अपने साथ ले जाने के लिए अपने माता-पिता को समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन यह संभव नहीं था। असहाय और दिल टूट जाने पर सिम्बा ने रोते हुए अनन्या को विदाई दी जो शायद यह अच्छी तरह जानता था कि वह अब लम्बे समय तक वापस नहीं आएगी।

कुछ महीने बीत जाने के बाद भी अनन्या अभी भी दुखी थी। एक दुर्भाग्यपूर्ण रात उसे अपने पिता का फोन आया। उनकी आवाज़ सुनकर ही वह बता सकती थी कि उनकी आवाज़ दुख और अपराधबोध से भरी थी। “सिम्बा घर से भाग गया”, उसके पिता ने कांपती हुई आवाज़ में कहा। सिम्बा के मासूम चेहरे को याद करते ही वह बहुत दुखी हो गई। वह गहरी उदासी के बोझ तले दबने लगी जो हर गुजरते पल के साथ बढ़ती जा रही थी।

एक हफ्ते बाद वह अपने घर आई। सिम्बा के खिलौने और खाने का कटोरा देखकर अनन्या फूट-फूट कर रोने लगी। पार्क में उनके साथ-साथ टहलने, रस्सी लाने का खेल खेलने की यादें उसके मन में हर समय आती रहती। अपने मन को शांत करने के लिए उसने पार्क में टहलने जाने का फैसला किया।

बाहर निकलते समय अनन्या ने सिम्बा का पट्टा अपने हाथ में पकड़ लिया। यह उसे करीब महसूस करने का उसका अपना तरीका था। पार्क में जाकर वह एक बेंच पर बैठ गई और दूसरों को उनके पालतू जानवरों के साथ टहलते हुए देखने लगी। वह अपनी यादों में इतना खोई हुई थी कि उसने ध्यान ही नहीं दिया कि एक कुत्ता उसकी ओर दौड़ते हुए, उसे देखकर अपनी पूंछ को हिलाते हुए और जीभ को बाहर लटकाते हुए आ रहा था। वह नहीं बता सकती थी कि वह कौन था। एक पल के लिए उसकी आंसुओं से भरी हुई आंखों ने उसके सामने के नज़ारे को धूमिल कर दिया था। फिर उसने उसे सुना। वह भौंक रहा था!

अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ सिम्बा उसकी गोद में कूद गया। कई दिनों से वह उसकी तलाश कर रहा था, उसकी गंध को खोजने की कोशिश कर रहा था। शायद, उसने भी यही सोचा था कि वह उसे अब फिर कभी नहीं देख पाएगा। लेकिन वह वहीं थी और उसका इंतज़ार कर रही थी।

सिम्बा रिरियाते हुए उसका चेहरा चाटने लगा, ऐसा लग रहा था जैसे कि वह उसे आराम देने की कोशिश कर रहा हो। उसे संभलने में कुछ मिनट लगे। जैसे ही अनन्या ने उसे उसका पट्टा बांधा, उसने अपने सिर को हिलाया और अपनी पूंछ लहराई।

इसका केवल एक ही मतलब था- यह घर वापस जाने का समय था।

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